Monday, September 15, 2014

योजना आयोग के ख़ात्मे की योजना पर हो पुनर्विचार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले के प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए अपनी अनेक प्राथमिकताएँ बतायीं उनमें योजना आयोग का ख़ात्मा भी शामिल है। क़रीब ढाई दशक से चल रहे आर्थिक सुधारों के दौर में योजना आयोग की भूमिका में काफी परिवर्तन हुआ है। लेकिन इसकी प्रासंगिकता को एकसिरे से ख़ारिज कर इसको विघटित कर देना अलग बात है। भारतीय जनता पार्टी और इसके पूर्व संस्करण—हिन्दू महासभा और भारतीय जनसंघ—योजनाबद्ध आर्थिक विकास का विरोध हमेशा से करते रहे हैं। अलबत्ता उन्होंने कभी यह नहीं बतलाया कि इसका विकल्प क्या है।
आइए पहले, योजना आयोग की ऐतिहासिक पृष्ठिभूमि पर एक नज़र डालते हैं। योजनाबद्ध विकास की दाग़बेल वर्ष 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में राखी गयी जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बने और उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि दरिद्रता, अशिक्षा और बीमारी से जुड़ी समस्याएं समाजवाद के रास्ते पर चलकर ही समाप्त की जा सकती हैं। उत्पादन और वितरण का मसला भी इसी रास्ते हल किया जा सकता है। उन्होंने अपने भाषण में नियोजित विकास की परिकल्पना सामने रखी जिसे अपनाकर देश की अर्थव्यवस्था को आगे ले जाया जा सकता है। उन्हों ने राष्ट्रीय नियोजन समिति के गठन का प्रस्ताव रखा और जवाहरलाल नेहरू से इस समिति के अध्यक्ष बने। नेहरू का मानना था कि नियोजन का वास्ता केवल देश के औद्योगीकरण से ही नहीं जुड़ा है बल्कि वह लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन को पूरी तरह बदलने का सामर्थ्य रखता है। वर्ष 1946 में नेहरू अंतरिम सरकार के अध्यक्ष बन गए और समिति का काम रुक गया। उधर देश के बड़े पूंजीपतियों ने बंबई योजना प्रस्तुत की। इसे टाटा-बिड़ला योजना और बॉम्बे प्लान भी कहते हैं। दूसरी ओर, कम्युनिस्टों और सोशलिश्टों ने मानवेन्द्रनाथ राय की अध्यक्षता में पीपुल्स प्लान प्रस्तुत किया। ग़रज़ यह कि देश स्वतंत्र होते-होते पूँजीपतियों से लेकर साम्यवादियों और समाजवादियों तक हर कोई देश के योजनाबद्ध विकास की बात करने लगा था।
भारत ने 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना की पेश की थी और 1965 तक लगातार दो पंचवर्षीय योजनाएं बनीं लेकिन इसके बाद भारत-पाक संघर्ष के कारण इसमें विराम आया। लगातार दो साल तक सूखे, मुद्रा का अवमूल्यन, मंहगाई और संसाधन में कमी के कारण योजना प्रक्रिया बाधित हुई और 1966 से 1969 के बीच तीन सालाना योजनाओं, जिसे प्लान हॉली डे के नाम से भी जाना जाता है के बाद 1969 में चौथी पंचवर्षीय योजना तैयार हुई। केंद्र में तेजी से बदलते हालात के बीच 1990 में आठवीं योजना पेश नहीं हो सकी और 1990-91 और 1991-92 में सालाना योजनाएं यानी एनुअल प्लान पेश किया गया। ढांचागत समायोजन नीतियां शुरू करने के दौरान 1992 में आठवीं योजना पेश की गई। पहली आठ योजनाओं में आधारभूत और भारी उद्योगों में विशाल निवेश के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की वृद्धि पर था लेकिन 1997 में नौवीं योजना के साथ र्सावजनिक क्षेत्र पर जोर कम हुआ है। देश में योजना पर मौजूदा सोच आम तौर पर यह है कि इसे संकेतात्मक होना चाहिए। फिलहाल 12वीं पंचवर्षीय योजना चल रही है और यह मार्च 2017 में खत्म होगी।
किसी भी देश की आर्थिक उन्नति व विकास इस बात पर निर्भर करता है कि वह देश अपने मौजूद संसाधनों को कैसे प्रयोग में लाता है। अमेरिकी अर्थशास्त्री डेरॉन एसमोगलू और राजनीति शास्त्री जेम्स रॉबिंसन ने संस्थाओं और आर्थिक विकास के बीच के रिश्ते का अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि किसी देश की आर्थिक प्रगति उस देश की संस्थाओं पर निर्भर करती है। देश की दीर्घवधि आर्थिक प्रगति के लिए सुचारु संस्थाओं होना अपरिहार्य है। बेहतर विकास के लिए बेहतर संस्थानों की आवश्यकता होती है जो नीतियां और योजनाएँ बनाएं और उनका प्रभावी क्रियान्वयन करें।
यह योजना आयोग नामक ही संस्था थी जिसने देश के विकास के रोडमैप और संसाधनों के वितरण की दिशा में कार्य करना शुरू किया। इस के ज़िम्मे यह काम आया कि कैसे केंद्रीय बजट में योजना संसाधनों को केंद्र एवं राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों के बीच आवंटित किया जाय। यह प्रत्येक योजना अवधि की शुरुआत में कार्यक्रमों का मूल्यांकन करता है। ग़ौरतलब है कि भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कंट्रोलर ऑडीटर जनरल) या सीएजी अगर केंद्र व राज्य सरकारों के विभागों और उनके द्वारा नियंत्रित संस्थानों के आय-व्यय की जाँच करती है तो वित्त आयोग केंद्र व राज्य सरकारों के बीच वित्त का बटवारा करता है। इस तरह, वित्त आयोग का काम मुख्य रूप से वित्त केंद्रित ही है क्योंकि यह राज्य की कुल संसाधन जरूरत और कर संग्रह की उसकी क्षमता का आकलन करता है। ऐसे में किसी न किसी संस्था को तो मूल्यांकन का काम करना ही होता और यह काम योजना आयोग करता है। प्रत्येक क्षेत्र में नीतियों का मूल्यांकन तो करता ही है साथ में सुझाव भी देता है। आयोग सरकार को स्वतंत्र दृष्टिकोण मुहैया कराता है। साथ ही यह हर एक राज्य के हिसाब से भी नीतियों की समीक्षा करके केंद्र और राज्यों दोनों को अपनी राय से अवगत कराता हैं। आयोग विभिन्न मंत्रालयों के बीच संबंधित मामलों में समन्वयकारी नीतियों में मदद करता है। मिसाल के तौर पर ऊर्जा को ही लें। यह विषय सात मंत्रालयों के अधिकार क्षेत्र में आता है। कई और मामले ऐसे हैं।
ग़ौरतलब है कि केवल केंद्र प्रायोजित योजनाएं या सेंट्रली स्पोंसर्ड स्कीम्स यानी सीएसएस ही योजना कार्यक्रम का हिस्सा नहीं हैं। इसमें परमाणु ऊर्जा, विज्ञान, राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे और बड़े बंदरगाहों वग़ैरा के क्षेत्र में केंद्र का खर्च भी शामिल है। अगर सीएसएस को खत्म भी कर दिया गया तबभी इसकी ज़रूरत तब तक रहेगी जब तक कि केंद्रीय क्षेत्र के सभी क्षेत्रों में निवेश होता रहेगा।

कहना न होगा कि ग़रीबी आकलन समेत ऐसे कई मुद्दे हैं जिनको योजना आयोग भलीभांति एड्रेस न कर पाया लेकिन इसका मतलब ये क़तई नहीं कि इसके अस्तित्व को ही ख़त्म कर दिया जाए। करना तो यह चाहिए कि आयोग को नीति निर्माण के बेहतरीन तकनीकों का वाहक बनाया जाय। लाफ़ीताशाही के मकड़जाल से बाहर निकाल कर इसे देश की आवाम के प्रति जवाब देह भी बनाया जाय। साथ ही दीर्घकालिक विश्लेषण के साथ इसको ऐसी संस्था के रूप में विकसित करना होगा जो आज के नवउदारवादी दौर में भी जनोमुखी विकास को उत्प्रेरित कर सके तभी सबका साथ और सबका विकास सुनिश्चित हो सकेगा।


(डीएनए  हिन्दी में 15 सितम्बर 2014 को प्रकाशित 'खत्म नहीं, योजना आयोग में कीजिए सुधार')

Thursday, September 4, 2014

लव जिहाद का सामाजिक इतिहास

तमाम हथकण्डों के बीच, दूसरे धार्मिक समुदाय विशेषतः अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में झूठा प्रचार करना फ़ासीवादियों तथा दक्षिणपंथी-सांप्रदायिकों का पुराना हथकण्डा रहा है। इसी संदर्भ में, हाल ही में लव जिहाद का एक नया हौव्वा खड़ा किया जा रहा है। इस मिथ्याप्रचार के अनुसार मुसलमान हिन्दू नवयुवतियों को प्यार के जाल में फँसाकर उनका धर्मांतरण तो कराते ही है साथ में अपनी आबादी भी बढ़ाते हैं। पिछले कई सालों से विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, हिन्दू जन जागरण समिति आदि संगठन इस अफ़वाह-तंत्र को विकसित करने के सुकार्य में पूरी तल्लीनता के साथ लगे हुए हैं। पिछले साल मुज़फ़्फ़रनगर का बहू-बेटी बचाओ आंदोलन और कुछ दिनों पहले मेरठ का धर्मांतरण वाला क़िस्सा इसी मिथ्याप्रचार की अगली कड़ी है।
इससे पहले, कर्नाटक और केरल लव जिहाद का प्रयोगशाला बना। 2010 में दक्षिण कर्नाटक में हिन्दू जनजागृति समिति ने यह प्रचार शुरू किया कि प्रान्त में तीस हज़ार हिन्दू नवयुवतियों को लव जिहाद वालों ने अपने प्यार-चक्कर में फाँसकर मुस्लिम बना लिया है। लगभग ऐसा ही प्रचार केरल में भी शुरू किया गया था और केरल के उच्चन्यायालय ने बाक़ायदा इसकी जाँच के आदेश भी दिए; मगर पुलिस को ऐसे किसी भी जिहाद का किसी भी तरह का कोई सबूत तक नहीं मिला और अदालत को यह केस बंद करना पड़ा। वहीं कर्नाटक पुलिस की जाँच से पता चला कि हिन्दू जनजागृति समिति ने जिस समयावधि के दौरान तीस हज़ार हिन्दू लड़कियों के गुम होने का प्रचार किया है, वह सरासर ग़लत है। उस समयावधि में ऐसी सिर्फ़ 404 लड़कियाँ गुम हुई और उनमें से 332 को पुलिस ने ढूँढ़ निकाला। पुलिस की जाँच से यह भी हक़ीक़त आशकार हुई कि इनमें से ज़्यादातर मामलों में हिन्दू लड़कियाँ हिन्दू लड़कों से शादी करने के लिए घर से गयी थीं। दूसरी तरफ़, मेरठ के एक मदरसे में पढ़ाने वाली युवती के धर्म परिवर्तन के आरोप भी ग़लत साबित हुए, लड़की ने जो हलफ़नामा दाख़िल किया है उसमें उसने कहा है कि वह अपनी मर्ज़ी से अपना धर्म बदला है।
ग़ौरतलब है कि लव जिहाद का मिथ्याप्रचार कोई नयी चीज़ नहीं है इसका सिलसिला 1920 के दशक में जनसंघ और आरएसएस के आविर्भाव के काल से अलग-अलग पेशबंदियों के तहत चल रहा था। 1924 में कानपुर में एक पुस्तिका प्रकाशित की गयी जिसका शीर्षक था—हमारा भीषण ह्रास। इस पुस्तक में यह बताया गया कि—भारी संख्या में आर्य महिलाएं यवनों और मलेक्षों (मुसलमानों) से निकाह कर रही हैं और गौभक्षकों को जन्म दे रही हैं। मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ा रही हैं। 1928 में एक कविता प्रकाशित की गयी जिसे बाद में तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने बैन कर दिया गया। इस कविता का शीर्षक था—चंद मुसलमानों की हरकतें’, इस कविता की चंद लाइनें इस प्रकार हैं:
तादाद बढ़ाने के लिए चल चलायी
मुस्लिम बनाने के लिए स्कीम आई..
इक्कों को गली गाँव में लेकर घूमते हैं
पर्दे को डाल मुस्लिम औरत बैठाते हैं।
लगभग इसी लाइन पर आज के आरएसएस के आनुषांगिक संगठन और हिन्दू रक्षक समिति जैसे गिरोह काम करते हैं। महाराष्ट्र के धुले ज़िले के ये गिरोह उन मोटरसाइकिल पर भी नज़र रखते हैं जिनपर लड़के के पीछे लड़की बैठी हो। ये लोग मोटरसाइकिल का नंबर ले कर स्थानीय ट्रांसपोर्ट दफ़्तर से यह पता करते हैं कि मोटरसाइकिल हिन्दू की है या मुस्लिम की, और अगर मोटरसाइकिल मुस्लिम की है तो उसके पीछे बैठी लड़की हिन्दू ही होगी!
लव जिहाद अफ़वाहसाज़ी के उसी बड़े गेम प्लान का हिस्सा है जिसे नरेन्द्र मोदी ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद वहाँ हुए चुनाव के दौरान कहा थाहम (मतलब हिन्दू) दो हमारे दो, वो (मतलब मुस्लिम) पाँच उनके पचीस। दरअस्ल इस गेमप्लान की जड़ें इतिहास में पैवस्ता हैं। एक सदी पहले 1909 में पंजाब हिन्दू महासभा के सह-संस्थापक यू॰एन॰ मुखर्जी ने हिन्दू : ए डाईंग रेस नामक किताब लिखी जिस में उन्होने ने जनसंख्या का नवमाल्थसवादी सिद्धान्त पेश किया था, जिसके अनुसार देश में मुस्लिम लोग ज़्यादा बच्चे पैदा करके हिन्दुओं से अपनी जनसंख्या अधिक करने वाले हैं और इस तरह बहुत जल्दी ही मुसलमान बहुसंखयक और हिन्दू अल्पसंखयक बन जाएंगे। मुसलमान भारत पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। मुसलमानों के बढ़ती जनसंख्या का यह बेसुरा और घिनौना राग यू॰एन॰ मुखर्जी की उसी पुस्तक से निकला है। पिछले कई सालों से इन दक्षिण पंथियों ने इसी राग फिर से अलापना शुरू कर दिया है, लेकिन अब वे इसे नए रंग में लपेट कर लाए हैं। पहले संघी संगठन मुसलमानों द्वारा अपनी जनसंख्या बढ़ाने का हौव्वा ही खड़ा करते थे, अब उन्होंने ने इसमें लव-जिहाद का डर भी जोड़ दिया है।
लव जिहाद का मामला सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ़ मिथ्याप्रचार का ही नहीं है बल्कि पूरे समाज में नारी-विरोधी पुरुषवादी सामन्ती सोच को बढ़ावा देने का भी है। ऐसी मानसिकता न सिर्फ़ वयस्क युवक-युवतियों के अपने ज़िन्दगी के फैसले खुद करने के अधिकार को नकारती है, बल्कि ये औरतों के बच्चा पैदा करने सम्बन्धी अधिकार को भी नहीं मानना चाहती। ऐसी सोच औरत को मात्र बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझने की ही है जो पूरी तरह से पुरुष के अनुसार पुरुष की मर्जी से बच्चे पैदा करे। इस सोच के अंतस में औरत या तो पुरुष, परिवार या धर्म की इज़्ज़त से जुड़ी कोई वस्तु है, या फिर भोगने की।
यह अकाट्य सत्य है कि बहुसंख्यक समुदाय (पढ़िये हिन्दू) जातीय, नस्लीय और लिंग के आधार पर ग़ैरबराबरी वाले समाज बंटा हुआ है। इसके अपने आंतरिक अंतर्विरोध हैं। स्तरीकृत समाजों में इन अंतर्विरोधों का होना अवश्यंभावी है। लव जिहाद दरअस्ल, बहुसंख्यक समाज के उपेक्षित, तिरस्कृत और शोषित तब्क़े का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटा कर इस झूठे डर का खौफ़ दिखा कर उनको एक प्लेटफॉर्म पर लाने का हथकंडा है। पिछली लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता ने संघ परिवार के हौसलों को और बुलंद कर दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2017 के चुनावों के मद्देनजर सांप्रदायिक शक्तियों का यह घिनौना खेल पूरे रफ़्तार से जारी है। इसके लिए ज़रूरी है कि संघपरिवार के इस झूठ को बेनक़ाब किया जाए और गंगा जमुनी तहज़ीब के उस पहलू को अंगीकार किया जाए जिसके बारे में नवाब वाजिद अली शाह ने कहा था:
हम इश्क़ के बन्दे हैं, मज़हब से नहीं वाक़िफ़
गर काबा हुआ तो क्या, बुतख़ाना हुआ तो क्या।

Wednesday, September 3, 2014

इबोला का गोला : महामारी का हौव्वा और दवाओं का कारोबार

इस वैश्वीकृत दुनिया में जब पोलियो, चेचक जैसी तमाम बीमारियों पर विजय हासिल करने के दावे किए जा रहे हैं तो वहीं इबोला नाम के खतरनाक वायरस ने तांडव मचाना शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डबल्यूएचओ ने इसे रिस्क ग्रुप-4 पेथोजेन अर्थात महामारी की श्रेणी में रखा है। डबल्यूएचओ के अनुसार यह हालिया चार दशकों की सबसे ख़तरनाक और व्यापक बीमारी है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुवात से अब तक, इबोला विषाणु से पीड़ित होकर मरने वालों की संख्या 1427 हो गई है जबकि 2615 लोग ऐसे हैं जो इस रोग से ग्रस्त होकर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। बताया जाता है कि इबोला बीमार इस वर्ष के शुरू में गिनी कोनाकरी, और उसके बाद लाइबेरिया, सिएरालोन और नाइजीरिया में फैली।
दुनियाभर में भय का पर्याय बना इबोला कोई नया रोग नहीं है। क़रीब 40 साल पहले इस रोग के केस मिले। इसको पहले इबोला हेमरेजिक फ़ीवर या रक्तस्रावी बुखार के रूप में जाना जाता था। पहली बार इस रोग के संक्रमण के केस 1976 में सूडान और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में मिले। इबोला नामक नदी के तट पर स्थित गाँव सर्वप्रथम इस रोग के प्रकोप का कोपभजन बना इसी के नाम से ये रोग जाना जाने लगा और इसके विषाणु को इबोला वाइरस कहा जाने लगा।
गोकि यह बीमारी चालीस साल पुरानी है लेकिन इसका अभी तक इसकी कोई वैक्सीन या टीका विकसित नहीं किया जा सका है। बड़ी-बड़ी फार्मास्युटिकल कम्पनियाँ और अनुसंधान संस्थाएं उन्हीं दवाओं को विकसित करने में दिलचस्पी लेती हैं जिससे उनको मोटी आमदनी हो सके। ज़ाहिर है, ग़रीब देशों में रहने वाले लोग अपनी बीमारी पर मोटी रक़म ख़र्च करने की हालत में नहीं होते हैं। लिहाज़ा इन देशों में होनेवाली बीमारियों के दवाओं को और ज़्यादा विकसित और प्रभावी बनाने लिए आवश्यक अनुसंधान इन कम्पनियों की वरीयता सूची से बाहर रहते हैं। कालाज़ार, मलेरिया, टीबी, दस्त और चागा रोग की दवाओं में नया अनुसंधान लगभग न के बराबर है। इन रोगों का इलाज दशकों पुराने फॉरमूले के आधार पर ही किया जा रहा है। अलबत्ता इबोला जैसी बीमारियों का हौव्वा खड़ा करके विकासशील देशों में अपनी उपयुक्त-अनुपयुक्त दवाओं को बेचना इनका प्रिय शग़ल और मार्केटिंग स्ट्रेटजी है। हालांकि जिस अमेरिकी कम्पनी ज़ेड मैपने इबोला के टीके को विकसित करने में दिलचस्पी दिखाई है वह कोई बहुत बड़ी कम्पनी नहीं है। यह पूरी तरह से पब्लिक फंडेड कंपनी है। यह अलग बात है इसके हौव्वे में अपार मार्केटिंग संभावनाओं की प्रत्याशा में ब्रिटेन की ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन जैसी बड़ी दवा निर्माता और वितरक कम्पनी इबोला टीके को लेकर काफी उत्साहित हैं।
अमेरिका की दवा कंपनी मैप बायोफार्मास्युटिकल ने इबोला के लिए ज़ेड मैप (ZMapp) नामक दवा इसी महीने के पहले सप्ताह में पेश कर दिया है। इस दवा को एक गुप्त सीरम बताया गया। यह मैप बायोफार्मास्युटिकल और कनाडा की कंपनी डिफाइरस (Defyrus) द्वारा उत्पादित दवाओं का कॉकटेल है। उल्लेखनीय है कि ज़ेड मैप दवा का परीक्षण अभी तक केवल बंदरों पर ही किया गया था। इसका मनुष्य स्वयंसेवकों पर परीक्षण 2015 में प्रस्तावित था लेकिन इबोला के अचानक प्रकोप और बीमारी के इलाज की हड़बड़ी में इसको एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट यानी प्रयोगात्मक उपचार के लिए उतार दिया गया है। किंग्स कॉलेज लंदन के डिपार्टमेंट ऑफ सोशल साइन्स एंड हैल्थ की प्रोफेसर अनेते रीद और बायोएथिक्स के विशेषज्ञ अमेरिकावासी एज़कील एमैनुएल का कहना है कि वे दवाएं जो अभी सिर्फ़ ट्रायल के फेज़ से गुज़र रही हों उनका उपयोग एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट के लिए करना अनैतिक तो है ही साथ में एपिडेमेयोलॉजिकल नज़रिये से भी दुरुस्त नहीं। वह भी तब जब औषधि की प्रभावकारिता और प्रभावशीलता दोनों का परीक्षण पूरी तरह से सम्पन्न न हुआ हो। वैक्सीन की अपेक्षा स्वस्थ्य तंत्र को विकसित करने की ज़्यादा ज़रूरत है। स्वस्थ्य तंत्र और स्वास्थ्य अवसंरचना का विकास इस बीमारी पर लगाम तो लगाएगा ही साथ में यह अन्य बीमारियों के उन्मूलन का संपार्श्विक (कोलैटरल) लाभ भी देगा।
ग़ौरतलब है कि इबोला के इस हड़बोंग के बीच फिर कोई बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी, मसलन ग्लाक्सोस्मिथलाइन, इस बीमारी की वैक्सीन तैयार कर देगी। फिर ये दवाएं ख़ासतौर से विकासशील देशों में खपाई जायेंगी। बीमारियों का हौव्वा खड़ा करना और फिर इनके टीके बेचना इन कंपनियों की मार्केटिंग का एक हथकंडा है। पहले भी हेपेटाईटिस-बी का हौव्वा खड़ा किया गया था और उसके बाद इसका टीके बाज़ार में आ गये। देखते ही देखते कंपनियों ने अपने मुनाफ़े का जुगाड़ पक्का कर लिया। लगभग यही तरीक़ा इन कंपनियों ने पशुओं में फैलने वाली बीमारी बर्ड फ़्लू के सिलसिले में भी अपनाया था। ठीक इसी तर्ज़ पर स्वाइन फ्लू का हव्वा खड़ा किया गया। इस बीमारी से भयाक्रांत होकर देश की तत्कालीन यूपीए सरकार ने स्वाइन फ़्लू से लड़ने के लिए ने देश के प्रत्येक ज़िले के लिए दस हज़ार ख़ुराक़ टेमीफ्लू नामक दवा ख़रीदी गयी थी। बाद में न तो बीमारी रही और न इन दवाओं कि उपयोगिता। अरबों रूपये की ये दवाएं एक्सपायर होने की वजह से नष्ट करनी पड़ीं। इसी ज़मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं इबोला बीमारी दवा कंपनियों का मार्केटिंग का हथकंडा या षड्यंत्र तो नहीं है!
यह बात बिलकुल आईने कि तरह साफ़ है कि डब्ल्यूएचओ, संयुक्त राष्ट्र और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं अमेरिका की जेबी की संस्थाएं हैं। अमेरिका पिछले कई सालों से आर्थिक मंदी की गिरफ़्त में है जिसका असर वहाँ की दवा कंपनियों में भी है। वहाँ की वित्तीय कंपनियों को तो बेलआउट और स्टिमुलस पैकेज तो मिल गए लेकिन दवा कंपनियां लगातार मंदी और व्यापार के संकट से जूझ रही हैं। इस मंडी से निकालने का सबसे सुलभ रास्ता है कि दवाओं और मेडिकल टेक्नोलॉजी की बिक्री विश्व बाज़ार में बढ़े। भारत समेत अन्य विकासशील देश इन कंपनियों का बृहत बाज़ार हैं।

इबोला का हौव्वा खड़ा करके, अमेरिकी मैप बायोफार्मास्युटिकल, कनाडा की टेकमीरा फार्मास्युटिकल्स कार्पोरेशन और डिफाइरस इंक जैसी मल्टीनेशनल कंपनियाँ एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट के आवरण में दक्षिण अफ़्रीक़ी देशों के लोगों को अपना तख़्त-ए-मश्क़ तो बना ही रही हैं वहीं दवाओं के कारोबार में लगी बड़ी कम्पनियाँ अपनी  वैक्सीन और ग़ैर ज़रूरी दवाएं बेचने की क़वायद भी कर रही हैं। उनकी नज़र हिन्दुस्तान पर भी है। इसलिए देश के हुक्मरानों को इसके बारे में कोई भी फैसले पर बड़ी तार्किकता के साथ विचार करना होगा। क्यूंकी इस बीमारी से पार पाने के लिए सुव्यवस्थित, मज़बूत और सुसंगत स्वास्थ्य-तंत्र पहली आवश्यकता है फिर उसके बाद कोई अन्य चीज़।
(डीएनए हिन्दी में 3 सितम्बर 2014 को प्रकाशित 'इबोला का गोला और दवाओं का कारोबार')

Saturday, August 30, 2014

सैनिटेशन की समस्या से जूझता भारत

खुले में शौच के मामले में अव्वल
गतवर्ष यूपीए सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि हम खुले में शौच के मामलों में विश्व में अग्रगणीय हैं; विश्व में खुले में शौच करने वाली आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है जो हमारे लिए शर्म की बात है। वहीं मौजूदा प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतन्त्रता दिवस के मौक़े पर लाल क़िले की प्राचीर से अपने भाषण में शौचालय की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। इससे पहले भी  उन्होने अपने चुनाव अभियान के दौरान कहा था देश को देवालय की नहीं शौचालय की ज़रूरत है। इन्हीं बातों की पुष्टि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनीसेफ की संयुक्त रिपोर्ट प्रोग्रैस ऑन ड्रिकिंग वाटर एंड सैनीटेशन-2014 अपडेट कर रही है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व भर में खुले में शौच करने वाले एक अरब लोगों में से 82 प्रतिशत लोग केवल 10 देशों में हैं। वैश्विक स्तर पर भारत ऐसा देश बना हुआ है जहां सबसे अधिक यानी तक़रीबन साठ करोड़ लोग खुले में शौच करने वाले लोग रहते हैं। देश के लगभग 130 मिलियन घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है। ग्रामीण इलाक़ों के लगभाग 72 प्रतिशत लोग अभी भी खुले में शौच करते हैं। अलबत्ता, इसी बीच अच्छी बात यह हुई है कि पिछली 10 जुलाई को वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि 2019 तक इस समस्या से मुकम्मल निजात हासिल करने का लक्ष्य है।
पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम
खुले में शौच करना शर्म की बात हो या न हो लेकिन इतना ज़रूर है कि इससे स्वास्थ्य पर भी अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसका डायरिया और अन्य मल-जनित जैसे रोगों से सीधा संबंध है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार खुले में शौच, असुरक्षित पानी, साफ़ सफ़ाई की कमी से होने वाली डायरिया जैसी बीमारियां दुनिया में हर रोज़ पांच वर्ष से कम उम्र के करीब दो हज़ार बच्चों की जान ले लेती हैं। इनमें से एक चौथाई मौतें अकेले भारत में होती हैं। अन्य अनुमानों के मुताबिक इससे मृत्यु के आंकड़े काफी ज्यादा हैं। वहीं विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया कि अपर्याप्त साफ़-सफ़ाई के कारण भारत को हर साल 5,400 करोड़ डॉलर मतलब तक़रीबन 3.2 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यह रकम भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की क़रीब 6 फ़ीसदी है।
भारत में कुपोषण के लिए साफ़ सफ़ाई या सैनिटेशन की ख़राब हालत भी ज़िम्मेदार है। देश में पांच साल से कम उम्र के 6.2 करोड़ बच्चों के उचित शारीरिक और मानसिक विकास के साफ़ सफ़ाई वाला वातावरण नहीं मिल पाता। वर्ष 2012 में 'सेव द चिल्ड्रन' के एक अनुमान के अनुसार देश में 43 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन के और 'कुपोषित' थे।
बच्चों के जन्म के दो वर्ष का समय उनके शारीरिक विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में खुले में शौच के कारण विभिन्न बीमारियों के कीटाणु बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। बच्चों के सामान्य कद में आ रही कमी जिसे जनस्वास्थ्य की शब्दावली में स्टंटिंग कहते हैं का सीधा नाता खुले में शौच से है। अमरीका स्थित प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के हेल्थ-एकॉनमिस्ट डीन स्पेयर्स ने अपने अध्ययन में इस बात का खुलासा किया कि खुले में शौच की बुराई के कारण भारतीय बच्चों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है—वे स्टंटिंग से ग्रसित हैं।
लैंगिक हिंसा की राह हमवार करता है
शौचालयों की अनुपलब्धता न सिर्फ़ एक जनस्वास्थ्य समस्या है बल्कि इसका नाता लैंगिक हिंसा और यौन हिंसा से भी है। गत मई महीने में उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले में दो युवतियों का पहले सामूहिक बलात्कार हुआ और उसके बाद उनकी हत्या कर दी गई। ख़बरों में बताया गया है कि दोनों नाबालिग़ लड़कियां अपने घर से शौच के लिए निकलीं थीं और उसके बाद लापता हुईं। यह वाक़्या बताता है कि भारत में शौचालय की कमी की सबसे बड़ी शिकार महिलाएं किस तरह होती हैं। गोकि महिलाओं पर हो रही लैंगिक हिस्सा का एक मात्र कारण खुले में शौच करना नहीं है बल्कि इसकी वजहें पृतिसत्तात्मक सोच की जड़ों में पिन्हा हैं मगर फिरभी खुले में शौच बलात्कारी दरिंदों को कन्डूसिव अवसर उपलब्ध कराता है। भारत ही नहीं केन्या और युगांडा जैसे अन्य देशों में खुले में शौच के लिए जाने वाली महिलाओं के साथ यौन हिंसा की अक्सर वारदातें होती हैं।
समस्या के सांस्कृतिक कारण
इस समस्या के सांस्कृतिक कारण भी हैं। हमारे देश में घर के अंदर ही शौचालय बनाने की परंपरा नहीं रही है। दो हज़ार साल पुराने ग्रंथ मनु-स्मृति में, अनुष्ठान अशुद्धि से बचने हेतु, घर से दूर खुले में शौच क्रिया को प्रोत्साहित किया गया है। आज भी गवों रहने वाले बहुतेरे लोग, घरों में शौचालय की सुविधा होने के बावजूद खुले में जाते हैं।
निश्चित ही यह गंभीर समस्या है और इससे छुटकारा हासिल करने के लिए इसके सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर भी विचार करना होगा। सांस्थानिक प्रयास के साथ साथ वैयक्तिक स्तर पर भी प्रयास ज़रूरी है; तभी तो गांधी जी ने भी कहा था कि स्वच्छता स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है अत: हमें खुले में थूकने व शंका निवारण आदि से संकोच करना चाहिए। दूसरी ओर संस्थागत प्रयास भी बहुत ही अच्छे नतीजे देते हैं। डबल्यूएचओ के एक अध्ययन के अनुसार साफ़-सफ़ाई में ख़र्च किया गया एक रुपया सामाजिक-आर्थिक फ़ायदे के लिहाज से नौ गुना प्रतिफल देता है। संक्रमण और बीमारी का स्तर घटता है जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर कम ख़र्च तो होता है; एक स्वस्थ्य व्यक्ति की उत्पादकता निश्चित रूप से अधिक होती है।
कैसे मिले निजात?
गत दशकों में हमने शौचालय का दायरा 27.5 करोड़ लोगों तक बढ़ाया लेकिन यह नाकाफी है। एसोसिएटेड प्रेस के एक आकलन के अनुसार लगभग 64 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं, जिससे रोजाना 72,000 टन मल का ढेर लगता है। इससे 10 ऐफिल टावर बनाए जा सकते हैं, राष्ट्रीय शर्म का यह एक ऐसा संग्रहालय, जो सभ्य समाज के हमारे दावे को तार-तार कर रहा है।
निर्मल भारत अभियान के तहत 2022 इस समस्या से मुकम्मल निजात हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन इस की प्राप्ति अभी तक दूर की कौड़ी बनी हुई है। तिस पर तुर्रा यह कि, 2014 के बजट में वित्तमंत्री ने प्रत्येक घर को 2019 तक स्वच्छता सुविधा उपलब्ध कराने के लिए "स्वच्छ भारत अभियान" चलाने की घोषणा कर दी। देखना अब यह है कि सरकार कितनी प्रतिबद्धता से इस राष्ट्रीय शर्म को दूर करती है।
(नवभारत टाइम्स में 29 अगस्त 2014 को प्रकाशित 'डिवेलपमेंट के अजेंडे का हिस्सा बने सैनिटेशन' का ग़ैर- संपादित आलेख)

Wednesday, August 6, 2014

कैसा है स्वास्थ्य बजट का स्वास्थ्य

पिछली दस जुलाई को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2014-15 का केंद्रीय आम बजट पेश किया। आम बजट सिर्फ़ देश की आमदनी और ख़र्च का लेखा-जोखा नहीं होता बल्कि यह यह सरकार की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं का भी आईना होता है। बतौर वित्त मंत्री यह उनका और मोदी सरकार का पहला बजट है। सबका साथ सबका विकास के वादे, मोदीनॉमिक्स की महारत के दावे और गुडगवर्नेंस के दिलासे के सुनहरे सपने दिखा कर लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के साथ बनने वाली मज़बूत सरकार के हाथ में केन्द्रीय बजट वह टूल है जिसके ज़रिये सरकार आम देशवासियों की मूलभूत समस्याएं हल करने की पहल कर सकती है।
बीजेपी और मोदी ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में आम लोगों तक अच्छी गुणवत्ता वाली एवं सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं को उपलब्ध कराने का वादा किया गया था। अब सवाल यह उठता है कि अरुण जेटली ने अपने बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए जो घोषणाएं की हैं, क्या वे लोगों की आकांक्षाएँ और ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त हैं?
सब पहले इस तथ्य से आरास्ता हो लिया जाय कि इस साल भी, तमाम दावों कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक ख़र्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के कम से कम 2 फ़ीसद पहुंचाया जाएगा के बावजूद मात्र 1.2 प्रतिशत पर ही सिमट कर रह गया है। गोकि, आदर्श स्थिति तो यह है कि स्वास्थ्य ख़र्च और जीडीपी का अनुपात 6 प्रतिशत हो। स्वास्थ्य पर सार्वजनिक ख़र्च का देश जीडीपी में हिस्सेदारी इस बात की ओर इशारा करती है कि कोई देश नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति कितनी संवेदनशील है।
ग़ौरतलब है कि, चिकित्सा और स्वास्थ्यकर्मी किसी भी चिकित्सा तंत्र की रीढ़ होते हैं। देश स्वास्थ्य-कर्मियों की भरी कमी से जूझ रहा है। वर्ष 2013-14 के आर्थिक सर्वेक्षण में स्वास्थ्य कर्मियों की कमी दूर करने के लिए उपायों पर अमल करने की बात कही गई थी। इसी क्रम में, इस साल के बजट में आंध्र प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल, महाराष्ट्र के विदर्भ एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में एम्स जैसे चार और संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है।
यद्यपि इन नए एम्स के लिए 500 करोड़ रुपये की धनराशि अलग से आवंटित करने की बात कही गई है, तथापि उक्त राशि निश्चित तौर पर ऐसे संस्थान स्थापित करने के लिए बहुत कम है। इसके अतिरिक्त, बजट में 12 नये सरकारी चिकित्सा संस्थानों की स्थापना का भी ज़िक्र है। चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध पर पिछले बजट में वित्तीय प्रविधान 6,278 करोड़ रूपये जो इस साल के बजट में घटा कर 5,110 कर दिया गया। ऐसे में यह सवाल जायज़ है कि जब तमान योजनाएँ अपर्याप्त वित्तपोषण और धनाभाव के चलते दम तोड़ रही हैं तो इस घटे हुए बजटीय एलोकेशन से कैसे 12 नए मेडिकल कॉलेज खोले जा सकेंगे।
इस बजट में नई ड्रग परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना एवं राज्य दवा विनियामक और खाद्य विनियामक प्रणाली का सुदृढ़ीकरण होगा और 31 मौजूदा प्रयोगशालाओं को भी सुदृढ़ किया जाएगा। पिछले कई सालों में जिस प्रकार दवाओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है, उसको देखते हुए विनियमन प्रणाली का सुदृढीकरण, ज़ाहिर है यह अच्छा क़दम है। लेकिन निजी निवेश के प्रति अत्यंत आग्राही यह सरकार निजी दवा कंपनियों के द्वारा औषधियों के मनमाने मूल्य निर्धारण में कैसे लगाम लगाएगी इस बात को लेकर थोड़ी शंका अवश्य है।
सरकार ने इस बजट में इस बात का वादा किया है कि वह ग्रामीणों की देखभाल के लिए स्थानीय स्वास्थ्य मामलों पर शोध व अनुसंधान के लिए 15 ग्रामीण स्वास्थय अनुसंधान केन्द्रों की स्थापना करेगी। प्रस्तावित योजना निःसन्देह बहुत ही अच्छी योजना है क्योंकि देश भले ही एपिडमेओलॉजिकल ट्रांज़ीशन की प्रक्रिया से गुज़र रहा हो लेकिन कई ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियां का फैलाव अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। टीबी, डाईरिया और मलेरिया जैसी बीमारियों से अभी भी बड़े पैमाने पर लोगों की जान चली जाती है। डब्ल्यूएचओ की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में टीबी के रोग से 13 लाख लोग असमय काल के गर्त में समा गए। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में फैलने वाली जैपनीज़ इन्सेफ़लाइटिस जैसी बीमारियां अभी भी काफी तादाद में लोगों को अपने ख़ूनी पंजे के गिरफ़्त में ले लेती हैं। इन बीमारियों पर अनुसंधान के ज़रिये काबू पाया जा सकता है।
भाजपा ने चुनाव के दौरान किए गए सबके लिए स्वास्थ्य के अपने वादे को पूरा करते हुए इस बजट में सबके लिए स्वास्थ्य अभियान की शुरुआत की घोषणा की है, जिसके तहत मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर नि:शुल्क दवाएं देने और नि:शुल्क जांच की बात कही गई है। सितमज़रीफ़ी यह है कि इस योजना के लिए अलग से कोई राशि आवंटित नहीं की गई है। ऐसे में इस महत्वाकांक्षी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए फंड कहाँ से आएगा यह एक बड़ा प्रश्न है। दूसरे, इस नि:शुल्क दवा की योजना में यह बात भी स्पष्ट नहीं है कि महंगी लाइफ सेविंग ड्रग्स मुफ़्त बांटी जाने वाली दवाओं की फ़ेहरिस्त में है या नहीं।
इस साल का कुल स्वास्थ्य बजट 35,163 करोड़ रुपए प्रस्तावित है जो पिछली वर्ष से मात्र 5 फ़ीसदी ज़्यादा है। पिछले वर्ष यह स्वास्थ्य बजट 32,278 था। कबीले ग़ौर बात यह है कि अगर मुद्रास्फीति की दर जो तकरीबन 8.9 प्रतिशत है को भी ध्यान मे रखे तो इस साल बजट बढ्ने के बजाए 3.9 प्रतिशत घाट गया है। यही हाल स्वास्थ्य क्षेत्रक अन्तर्गत आने वाली योजनाओं का भी है—पिछले साल एनआरएचएम के लिए 21,103 करोड़ रुपए एलोकेट किए गए थे जो इस साल 21,912 करोड़ रूपये ही है।
वाज़ेह हो कि स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ़ डॉक्टर, दवा और अस्पताल नहीं हैं बल्कि वे सारे कारक जो एक इंसान के स्वास्थ्य को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित हैं। मसलन, शिक्षा, रोज़गार, सामाजिक सुरक्षा आदि जैसी तमाम योजनाएँ भी स्वास्थ्य के बृहत्तर लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस स्सल के बजट में यदि हम सामाजिक क्षेत्रक के बजट पर नज़र डालें तो यह वर्ष 2013-14 में जीडीपी के अनुपात में 15.7 प्रतिशत था जो इस साल के बजट 2014-15 में घाट कर 13.9 प्रतिशत पर पहुँच गया है। यह अजीब विरोधभास है कि एक ओर सबके लिए स्वास्थ्य का दवा किया जा रहा ही और दूसरी ओर इस उद्देश्य की पूर्ति में सहायक योजनाओं के पर कतरे जा रहे हैं। इस बजट में स्वास्थ्य पर सिर्फ़ 1.2 फ़ीसदी, शिक्षा पर 3.5 और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए मात्र 0.15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी। सामाजिक क्षेत्र में इतनी मामूली बढ़ोत्तरी मात्र ज़बानी जमा ख़र्च दिखाता है नाकि अपने वचनों के प्रति प्रतिबद्धता।

जनता को सुनहरे ख़्वाब दिखाने में माहिर प्रधानमंत्री मोदी, वित्तमंत्री जेटली व उनकी सरकार ने इस बजट में तमाम वादों के बावजूद इस बात का कोई ख़ाका न पेश कर पाये जो यह बताए कि स्वास्थ्य सेवाओं को कैसे सर्वसुलभ बनाया जाएगा। देखना अब यह है कि मोदी सरकार ने देश की जनता से जो वादा किया है, क्या वाक़ई उसे वह निभाएगी या हमेशा की तरह ये सारे वादे महज़ खोखले ही साबित होंगे।

Saturday, August 2, 2014

मुस्लिम समुदाय को है नए नेतृत्व की दरकार

यह भारत के आम मुसलमानों की सबसे बड़ी बदक़िस्मती है कि उनका नेतृत्व हमेशा या तो कठमुल्ला उलेमाओं के हाथ में रहा है या राजनीतिक-वैचारिक दिवालियेपन का शिकार पतित राजनीतिक नेताओं के हाथ में। वे कठमुल्लाओं, जिनका सारा चिंतन चौदह सौ साल पुरानी उन अंधेरी गुफ़ाओं में मह्व-ए-ख़्वाब है, जिन्हें न ही समाज और राजनीति में आ रहे परिवर्तनों की कोई आहट उन्हे इस चिरकालीन निंद्रा से उठा सकती है और न ही वे निकलना चाहते हैं। उन्हें न आम मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक दशा और दिशा के बारे में चिंता है और, न ही उनके पास दरपेश चुनौतियों को समझने का कोई कारगर टूल है। उनके पास वही सदियों पुराना एक चश्मा है। वह सब चीज़ उसी से देखते हैं। वह मुसलमानों को कभी धार्मिक कूप-मंडूपता के पिंजड़े के बाहर नहीं निकालना चाहते।
दूसरी तरफ़, मुसलमानों नेतृत्व या तो उन विशुद्ध राजनैतिक नेताओं के हाथ में है जिनका सारा ध्यान इस पर केन्द्रित रहता है कि किस प्रकार ऐसा माहौल तैयार किया जाये कि स्वयं का महत्व और स्वयं की रक्षा के बंदोबस्त का जुगाड़ हो। राष्ट्र की मुख्य धारा में मुसलमानों को कैसे और किस प्रकार से भागेदारी हो, उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति कैसे हो, इन सबकी तनिक भी चिंता न मुस्लिम राजनीतिक नुमाइंदों को और न ही कठमुल्ला उलेमाओं को।
ईद से तीन दिन पहले, अलविदा जुमा की नमाज़ के बाद लखनऊ में शिया धर्म गुरु और इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जव्वाद ने सैकड़ों नमाज़ियों और रोज़ेदारों का हुजूम लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री का घेराव करने जा रहे थे। शहीद स्मारक पहुचते ही पुलिस ने प्रदर्शनकारियोंको रोक लिया। जिसपर कुछ शरारती तत्वों ने पुलिस पर पथराव किया इसके जवाब में पुलिस ने पदर्शन में जा रहे लोगों पर बेतहाशा लाठियां भांजनी शुरू कर दी। जिसमे एक बुज़ुर्ग की जान गयी और सैकड़ों घायल हो गए।
सवाल यह नहीं कि पुलिस की कार्यवाही इतनी भायावह क्यों हुई? या यह कि सरकार या मंत्री खिलाफ प्रदर्शन करना ग़लत है। बल्कि, सवाल यह है कि प्रदर्शन का नेतृत्व किनके हाथों में था और वे कौन से मांग मनवाने जा रहे थे। जब इस बात का पूरा-पूरा अंदेशा और इल्म हो कि लखनऊ जैसी जगह में उपद्रवी तत्व हर वक़्त मौके के इन्तेज़ार में रहते हैं तो ऐसे ग़ैर-जिम्मेदाराना क़दम क्यों उठाए जाएँ।
देश के मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक हालात ख़ास करके शिक्षा जो मानव विकास का अहम पहलू है पर अगर नज़र डालें तो बहुत ही निराशाजनक तस्वीर उभरती है। देश की मुस्लिम आबादी में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से तो काफी कम है ही। वहीं उच्च शिक्षा में इस वर्ग के बच्चों की सकल नामांकन दर गैर मुस्लिम बच्चों की तुलना में करीब आधी है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और पंजाब में मुस्लिम साक्षरता दर इन राज्यों की औसत साक्षरता से काफी कम हैं। बिहार की साक्षरता दर 61.80 प्रतिशत की तुलना में वहां मुस्लिम साक्षरता दर 36 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश की साक्षरता दर 67 प्रतिशत की तुलना में मुस्लिम साक्षरता दर 37.28 प्रतिशत है। वहीं, मुस्लिम समुदाय के बच्चों की सकल नामांकन दर 8.7 प्रतिशत थी जबकि गैर मुस्लिम छात्रों की सकल नामांकन दर 16.8 प्रतिशत थी।
शिक्षा का स्तर किसी समाज को अच्छे रोज़गार के मौक़े फ़राहम करता है और इनके लिए सक्षम बनाता है। उल्लेखनीय है कि, मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और स्वनिर्मित संगठन, कठमुल्ला उलेमा और नेता जो पिछले सात दहाईयों से मुसलमानों की नुमांइदगी का दावा तो करते रहे हैं लेकिन ये संगठन और लीडरशिप भारत के मुसलमानों की कितनी हमदर्द हैं, इसका अंदाजा सिर्फ इस हकीकत से लगाया जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा के केन्द्रों—कॉलेज और विश्वविद्यालयों—तो खोलना दूर रहा वे मुसलमानों के आधुनिक-वैज्ञानिक शिक्षा ग्रहण करने का ये कह कर विरोध करते रहे हैं कि ये ग़ैर इस्लामी शिक्षा है।
कठमुल्लों की ये जमात मस्जिद और मजलिस के मिम्बर पर से मुसलमानों के भीतर की सामाजिक बुराइयों को दूर करने की तक़रीर-ओ-तरगीब भले ही न देती हो अलबत्ता वो हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी राय से जरूर नवाज़ती है। कुछ दिन पहले मशहूर सुन्नी मौलाना सलमान नदवी ने बग़दादी को ख़त लिख कर बक़ायदा ख़लीफ़ा मान लिया जबकि दुनिया भर के प्रगतिशील उलेमाओं ने बग़दादी की इस्लामी ख़िलाफ़तकी स्थापना को ग़ैर-इस्लामी कह कर ख़ारिज कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ़ प्रमुख शिया मौलाना आग़ा रूही बड़े गर्व से एक न्यूज़ चैनल पर बता रहे थे कि उनका बेटा इराक़ में आइएसआइएस के विरुद्ध जिहाद कर रहा है। जंग इराक़ में हो रही है और उलेमा शिया-सुन्नियों को वरग़लाने में जुटे हुए हैं। शिया मौलाना अपने बेटे की शौर्यगाथा सुना सुना कर लोगों को क़ुरबानी देने के लिए उकसा रहे हैं तो उधर सुन्नी मौलाना को यह ज़र्रा बराबर एहसास नहीं कि उनका यह बग़दादी के शान में क़सीदे पढ़ना तालिबानीकरण के रास्ते को ही हमवार करेगा।
एनएसएसओ के आंकड़ों के अनुसार अधिकांश मुसलमान छोटे-मोटे कारोबार या लघुस्तरीय हथकरघा जैसे असंगठित क्षेत्रों से जुड़े हैं। निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के रोज़गारों में मुसलमान समुदाय की भागीदारी आबादी में उनके अनुपात से कहीं कम है। स्वरोज़गार में बढ़ता हुआ इनका हिस्सा वास्तव में असंगठित क्षेत्र में बढ़ रहा है। कहना न होगा कि असंगठित सेक्टर तमाम तरह की सामाजिक सुरक्षाओं से महरूम है। इसके पास बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्थाब, रोग, बेरोजगार आदि के कारण उत्पन्न जोखिमों का सामना करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं हैं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इन मुल्लाओं और अपना हित साधने वाले नेताओं ने अशिक्षा और बेरोज़गारी के खिलाफ़ कभी कोई बड़ा धरना या प्रदर्शन नहीं किया। ऐसी शायद ही कोई मिसाल हो जब इन कठमुल्लों ने कभी मज़दूरों के हक़-हुक़ूक़ को लोगों को लामबंद कर के सड़कों पर उतारा हो। मगर हाँ इतना तो ज़रूर है कि वक़्फ़ सम्पत्तियों के माल को गपकने के ख़ातिर अक्सर ये सड़कों पर उतर आते हैं।
इन कठमुल्लाओं के लिए किसी दूर-दराज़ मुल्क में मुसलमानों के साथ हो रही ज़्यादती तो ज़रूर एक मसला है और उस पर अक्सर-ओ-बेशतर लफ़्फ़ाज़ियाँ भी करते रहते हैं लेकिन ये अपने ही मुल्क के मसायल पर चुप्पी का मोटा लबादा ओढ़ लेते हैं। अभी दो-तीन दिन पहले दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमामअहमद बुख़ारी जामा मस्जिद के इलाक़े की तहज़ीब को बचाने का बीड़ा उठाया है और उनका निशाना बने हैं वे ग़रीब, बेसहारा, मज़लूम और बेघर लोग, जिन्होंने कई रैन-बसेरो में पनाह ले रखी है। ज़ाहिर है, इनमें से अधिकांश पसमांदा मुसलमान और दलित हैं। तहज़ीब, मज़हब, शरीयत और तरीक़त की बलिवेदिका पर इन्हीं ग़रीब और पसमांदा लोगों की ही बलि चढ़ाई जाती है।

साल दर साल हाशिए पर पहुँचते मुस्लिम समुदाय को अपने समाज के भीतर की आवाज़ों को सुनना पड़ेगा और लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया को बढ़ाना होगा। साथ ही, अपना नेतृत्व उन सक्षम हाथों में सौंपना पड़ेगा जो बहुत तेज़ी से बदलते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रदृश्य में सही निर्णय ले सकें और समुदाय को राहे रास्त पर ले जा सकें। जिसके लिए पहली शर्त है कि मज़ार-मस्जिद-मजलिस-मिंबर-मुल्ला-मुजाविर को धर्मस्थल तक महदूद कर दिया जाय। धर्म को राजनीति से घाल-मेल करने के प्रयास को रोका जाय क्यूंकी धर्म और राजनीति का घालमेल ने दुनिया को हमेशा तबाही की गहरी खाईं में ढकेलता है।
(डीएनए  हिन्दी में 1 अगस्त को मुस्लिम समुदाय को है नुमाइंदगी की दरकार' के शीर्षक से प्रकाशित)

Monday, March 24, 2014

क्षय रोग के आर्थिक और सामाजिक परिणाम

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ ने आगामी 24 मार्च को विश्व क्षय रोग दिवस घोषित किया है। इस दिवस का ध्येय है लोगों को इस बीमारी के विषय में जागरूक करना और इस बीमारी की रोकथाम के लिए क़दम उठाना है। दुनिया में नौ करोड़ लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं और प्रत्येक वर्ष दस लाख तीस हज़ार लोगों की इससे मौत हो जाती है। हर साल तीस लाख लोगों को यह रोग अपने शिकंजे में लेता है। इस साल की थीम रीच द 3 मिलियन है। मतलब यह कि कैसे इन तीस लाख लोगों को असमय काल का ग्रास बनने से रोका जाये।
विकसित देशों से ये रोग लगभग ख़त्म हो चुका है लेकिन भारत जैसे विकासशील देश इस रोग के ख़ूनी पंजों से अभी तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। देश में इस रोग की व्यापकता इतनी भयंकर है कि इस मर्ज़ से जूझ रहे लोगों की फ़ेहरिस्त में हर साल लगभग दो लाख लोगों का इज़ाफ़ा होता रहता है और हर साल लगभग तीन लाख तीस हज़ार लोग इस बीमारी की वजह से मौत का निवाला बन जाते हैं। हर दिन लगभग 750 लोग टीबी का शिकार बनते हैं और हर दो मिनट पर एक व्यक्ति मौत की गिरफ़्त में होता है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि टीबी के रोकथाम और उपचार में भारत का विकासशील देशों के बीच सबसे ख़राब प्रदर्शन है।
स्वास्थ्य और प्रगति का आपस में बाहमी (दो तरफ़ा) रिश्ता है। दोनों एक दूसरे का कारण और परिणाम हैं। स्वस्थ्य कार्यशील मानव पूँजी किसी भी देश की आर्थिक संवृद्धि की ज़मानत होती है। स्वास्थ्य आर्थिक पहलुओं के दोनों—व्यष्टि और समष्टि स्तरों पर क्रियाशील होता है। अमर्त्य सेन के शब्दों में अच्छा स्वास्थ्य व्यक्तिगत स्तर पर बेसिक कैपेबिलिटी या मौलिक योग्यताओं के घटक के रूप आर्थिक सफलताओं के सृजन में सहायक होती हैं। स्वास्थ्य हमें और उत्पादक और अधिक उत्पादन एवं आय का सृजन करने में सहायक होता है। वहीं कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जैफ़री सैश अपनी पुस्तक द एंड ऑफ पॉवर्टी में कहते हैं कि किसी देश के स्वस्थ नागरिक उस देश को प्रगति के रास्तों पर ले जाते हैं। इस पुस्तक में "क्लीनिकल इक्नोमिक्स" की शब्दावली का प्रयोग करते हुए इस बात को बड़ी तार्किकता से कहा गया है कि कोई भी देश टीबी, एड्स और मलेरिया जैसी बीमारियों से छुटकारा पाये बग़ैर विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में स्थान नहीं बना सकता।
विश्व बैंक के एक अनुमान के मुताबिक़ टीबी के कारण उत्पादकता में भी काफ़ी हानि होती है जो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 4 से 7 प्रतिशत है। टीबी का मर्ज़ ग़रीबी—बीमारी के दुष्चक्र को और मज़बूत करता है। एक अध्ययन के अनुसार इसके इलाज में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 29,126 रूपए ख़र्च करने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, एक मजदूर को, लगभग 83 दिन मज़दूरी भी छोड़नी पड़ती है और साथ ही लगभग 14686 रुपए के ऋण का अतिरिक्त भार भी पड़ता है। भारत जैसा देश जहां 93 प्रतिशत कामगार तब्क़ा इन्फ़ारमल सैक्टर में है और जिसे कोई वित्तीय सुरक्षा प्राप्त नहीं है को इस दुष्चक्र में फँसने के बहुत ही ज़्यादा संभाव्यता रहती है।
अस्पतालीकृत बीमारियों की वजह से ग़रीब परिवारों को वित्तीय संकट में फंसने की बहुत ही ज़्यादा संभाव्यता रहती है। देश में, स्वास्थ के लिए जेबी ख़र्च या आउट-ऑफ़-पॉकेट एक्सपेंडीचर यानी निजी ख़र्च न सिर्फ ज़्यादा हैं बल्कि हाल के दिनों में तेजी से बढ़ा भी हैं। एन॰एस॰एस॰ओ॰ के सर्वेक्षण के अनुसार, 1995-96 और 2003-04 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल में भर्ती लागत में 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि शहरी क्षत्रों यह बढ़ोत्तरी 126 प्रतिशत तक हुई। ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्वास्थ्य पर निजी ख़र्च अक्सर उन परिवारों को वहन करना होता है जो ये ख़र्च बर्दाश्त न कर पाने की स्थिति में होते हैं। अतः जनसँख्या का वह पांचवा हिस्सा जो ग़रीबी रेखा के ठीक ऊपर है, को अगर कभी किसी गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ता है तो वह स्वतः ग़रीबी रेखा के नीचे चला जाता है।
ग़ौरतलब है कि टीबी से ग्रसित व्यक्ति को आर्थिक ही नहीं सामाजिक क़ीमत भी चुकानी पड़ती है। डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि टीबी 15 से 44 आयु वर्ग के महिलाओं की मृत्यु के शीर्ष तीन कारणों में से एक है। चेन्नई स्थित राष्ट्रीय टीबी अनुसंधान संस्थान के ताज़ा अध्ययन के अनुसार टीबी होने मात्र से ही अनेक महिलाओं को घर से बेघर कर दिया जाता है। लगभग सौ महिलाओं में से एक महिला को इस बीमारी की बजह से बाहर निकाल दिया जाता है। गोकि यह बीमारी अब उतनी ख़तरनाक नहीं रही है लेकिन उसके उपचार को पूरा न करना और सामाजिक स्तर पर हेय दृष्टि से देखे जाने के डर से अभी भी यह रोग एक ख़ामोश क़ातिल (साइलेंट किलर) की तरह अपनी पैठ बनाए हुए है।
ग़रीबी और बीमारी, मुख्यतः टीबी के रोग, का चोली दामन का साथ है। भारतीय साहित्य में भी निर्धनता और व्याधि के अंतर्संबंध का भरपूर वर्णन मिलता है। उर्दू के मशहूर अफ़सानानिगार नय्यर मसूद के बहुप्रसिद्ध अफ़साना गंजीफ़ा में ग़रीबी बीमारी पर और बीमारी ग़रीबी पर हावी है। वहीं, अब्दुल बिस्मिल्लाह का प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यास झीनी झीनी बीनी चदरिया, जो बनारस के बुनकरों के शोषण और बेचारगी का विस्तृत आख्यान है, में उसके मुख्य पात्र मतीन की असहायता यूं बयान करता है कि—अलीमुन को टी.बी. हो गयी है। मतीन को मालूम है। लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता। असाहयता और बेचारगी की यह दास्तान सिर्फ़ मतीन की ही नहीं बल्कि देश के उन तेरह लाख ग़रीब लोगों की है जो इस बीमारी से लगातार जूझ रहे हैं।

नव्वे के दशक में देश के तत्कालीन वित्त मंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व में शुरू की गयी उदारीकरण नीतियों के अनुसार न सिर्फ़ स्वास्थ्य बल्कि सभी सामाजिक सेवाओं के वित्तपोषण में लगातार कटौती जारी है। आईएमएफ़ और विश्व बैंक के सामने घुटनाटेकू नीतियों नें आर्थिक विषमता की खाई को और गहरा किया है। चिकित्सतामक सेवाएँ आम नागरिकों की पहुँच से परे होते जा रही हैं। आगामी दो महीनों में विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र में चुनाव होने जा रहा है। तमाम पार्टियों के बीच अनेक मुद्दों पर तो बहसें जारी हैं परन्तु आर्थिक नीतियाँ जो एक व्यक्ति के साथ साथ पूरे राष्ट्र को प्रभावित करती है, मुख्य मुद्दा नहीं बन पाया है। अब आने वाला समय ही बताएगा कि राजनीतिक पार्टियां और देश के योजनाकारों को करोड़ों मतीनों की चिंता है या नहीं।