Friday, October 25, 2013

ग्लोबलाईज़ेशन (globalisation) ने इंडस्ट्रियलाइज़ेशन (industrialisation) की जगह फानांसियालाईज़ेशन (financialization) को मुतआरुफ़ करा के करेंसी के ज़रिये दुनिया के मुल्कों के वसाएल पर क़ब्ज़ा करना जारी रखे हुए है, जबकि अमेरिका के नोबेल इनामयाफ़्ता आलिमी बैंक (world bank) के साबिक़ मुशीर जोज़ेफ स्टिग्लिट्ज़ (Joseph Stiglitz) अपनी किताब नाबराबरी की क़ीमत (The Price of Inequality) में लिखा है कि अमेरिका जब क़र्ज़दार नहीं था और तरक़्क़ी के उरुज पर था उस वक़्त अमेरिका के साहूकार और सरमायादार मुल्क के अंदर सरमायाकारी (investment) को तरजीह देते थे और सरमायाकारी बराए रोज़गार (मुलाज़िमत) की जाती थी लेकिन सट्टाबाज़ी (speculation) और करेंसियों के खेल ने सरमायाकारी का रंग बदल दिया है और अब यह सरमायाकारी ग्लोबलाईज़्ड (globalised) हो गयी है और सरमायाकारी सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए होती है. यह नुक्ता, यह बात अक्सर मुल्क की मईशत के मैनेजरों को समझ नहीं आती कि कार्ल मार्क्स ने क्यूँ मुनाफ़ा और सूद को जोड़कर सरप्लस वैल्यू (surplus value) का नज़रिया दिया था. वह इसलिए कि क़यासआराईयों और सट्टा बाज़ारी के खेल ने काग़ज़ यानि करेंसी को शेर बना दिया. 1945 में ब्रेटन वुड्स के तहेत जब आई॰एम॰एफ़॰ और आलिमी बैंक को मुताआरिफ़ (introduce) कराया गया तो लॉर्ड कीन्स, जो सरमायादाराना निज़ाम का सबसे बड़ा माहिरे इक़्तसादियात था, उस ने कहा था कि क़र्ज़ों के खेल से दुनिया को काग़ज़ी शेर बना दिया जाएगा. साबिक़ सोविएत यूनियन के जोज़ेफ स्टालिन ने कहा था कि अब सरमायादारी निज़ाम जदीद ग़ुलामी को तौसीक़ कर रहा है.

क़िस्सा कोताह यह कि, रुपए की घटती हुई क़ीमत को इसी—फानांसियालाईज़ेशन के पस-ए-मंज़र में देखना चाहिए.
इंसाफ़ (ख़ास तौर पर समाजी इंसाफ़) के लिए ऐसे समाजी इंतज़ामात की ज़रूरत है जिसमे सभी लोगों का समाजी-सियासी ज़िंदगी में साथियों (peers) के तौर पर हिस्सा लेना यक़ीनी बनाया जा सके. नाइंसाफ़ी पर क़ाबू पाने का मतलब है ऐसी संस्थागत बाधाओं (institutionalized obstacles) को ख़त्म करना जो कुछ लोगों को दूसरों के साथ समाजी तअल्लुक़ात (social interaction) में मुकम्मल व बराबर का हिस्सा लेने में रोड़ा अटकाती हैं. इन संस्थागत बाधाओं—इक़्तसादी ढांचा (economic structure), इन्स्टीट्यूशनल हाईरारकी, एक्सक्ल्यूश्ज़्न (exclusion) और प्रोसीजर्स (procedures) के हवाले से भी देख सकते हैं. इक़्तसादी ढांचा जो समाज के पिछड़े लोगों (पसमान्दा) की उन वासएल तक की रसाई को महदूद करता हो जिसके ज़रिए उनकी समाजी ज़िंदगी में बराबर की हिस्सेदारी होसके; इन्स्टीट्यूशनल हाईरारकी दरअस्ल, सक़ाफ़ती इक़दारों की दर्जाबंदी (हाईरारकी) है जो पसमान्दा को मतलूबा स्टैंडिंग से रोक सकती हैं और रही बात एक्सक्लूश्ज़्न की, तो जनाब इसके ज़रिए एक ख़ास तब्क़े को उसकी शिनाख़्त (आइडैनटिटी) की बिना पर समाजी-सियासी हिस्सेदारी से महरूम कर दिया जाता है, मुखतलिफ़ क़िस्म के प्रोसीजरल नार्म्स—एक्सक्लूश्ज़्न का मोसर हरबा—बराबर की हिस्सेदारी में रुकावट पैदा करते हैं.
अब सवाल उठता है कि, समाजी इंसाफ़ मे हाएल इन संस्थागत बाधाओं से निजात कैसे मिले? मोटे तौर पर इन तीन संस्थागत बाधाएं—इक़्तसादी ढांचा, इन्स्टीट्यूशनल हाईरारकी और एक्सक्ल्यूश्ज़्न से निजात के लिए, तीन टूल—रीडिस्ट्रिब्यूशन (redistribution), रिकगनीशन (recognition) और पार्टीसीपेशन (participation) हैं. इन तीनों टूल्स का कारगर इस्तेमाल इस बात पर मुनहसर करता है कि तब्क़-ए-पसमान्दा की सियासी समझ ओ शऊर क्या है और वो अपने हक़-ओ-हुक़ूक़ की लड़ाई को लेकर कितना बेदार है...


इस ज़मन में, "पसमांदा स्टूडेंट्स फ़ोरम, जे॰एन॰यू॰" मुस्लिम समाज के दबे-कुचले-दलित (पसमान्दा) लोगों की मुख्य-धारा में शमूलियत के लिए जारी किए गए विमर्श का हिस्सा है और दिन-ब-दिन इस विमर्श को आगे बढ़ा रहा है.
समाजी इंसाफ़ (social justice) और इकनॉमिक वेल-बीइंग (well-being) के लिए ज़रूरी है कि समाज में स्ट्रकचरल चेंज लाया जाए, और यही तबदीली—स्ट्रकचरल चेंज और मेयार-ए-ज़िन्दगी (standard of living) में बेहतरी—ही, दरअस्ल, तरक़्क़ी (development) है.

सियासी आज़ादी के सिर्फ़ उसी वक़्त कुछ माने होते हैं जब की लोगों को तरक़्क़ीयाती सरगरमियों के नतीजे में समाजी इंसाफ़ मिले और उनकी ज़िंदगी पहले के मुक़ाबले में बेहतर हो. ज़राअत (agriculture), सिनअत (industry), साइन्स, टेक्नोलोजी, सेहत, तालीम, ग़र्ज़ कि हर शोअबा-ए-ज़िन्दगी में हमारी पॉलिसियां इसी उसूल के तहेत वज़अ कि गईं हों और पाए-तक्मील को पहुंचायी गईं हों. अब सवाल उठता है कि इन पॉलिसियों को बनाता कौन है? एक मुनज़्ज़म मईशत (economy) में पॉलिसियों को बनाने में इन्सटीट्यूशन (इदारों) का अहेम किरदार होता है.
माहीरीन-ए-इक़्तसादियात (economists) और सियासी-ओ-समाजी साइन्सदानों (social and political scientists) के बीच, एक तरह से, यह इत्तेफाक़े राय है कि डगलस नॉर्थ (Douglas North) का यह मफ़रूज़ा—एक मुआशरे की समाजी, इक़्तसादी, क़ानूनी और सियासी तंज़ीमें यानी इसके इदारे (institutions) इसकी इक़्तसादी कारकरदगी (performance) का बुनियादी उंसुर है. इन्स्टीट्यूशन लिज़्म की सारी बहेस, मोटे तौर पर, दो मफ़रुज़ों (propositions) पर मुश्तमिल है: अव्वल, इदारे माने रखते हैं या यूँ कहें कि इन से फ़र्क़ पड़ता हैवो मेयार (standard), अक़ाएद (belief) और आमाल (actions) को मुतास्सिर करते हैं, लिहाज़ा वो नताएज (outcomes) की तश्कील करते हैं. दूसरे, इदारे एण्डोजेनस (endogenous) हैं—उनकी शकल और उनके कामकाज उनके ज़हूर (emergence) और बक़ा (endurance) के हालात पर मुनहसर होते हैं. मतलब यह कि, मुआशरे का समाजी निज़ाम और दीगर इन्स्टीट्यूशन्स एकदूसरे से असरअंदाज़ भी होते हैं और एकदूसरे को असरअंदाज़ भी करते हैं. बअल्फ़ाज़े दीगर, समाजी इंसाफ़ ओ तरक़्क़ी के लिए समाज और इसके इन्स्टीट्यूशन्स को ज़्यादा से ज़्यादा डेमोक्रेटाईज़ करना होगा.


तारीख़ी एतबार से, हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज में, तब्क़-ए-अशराफ़ का इन्स्टीट्यूशन्स (समाजी, मआशी और सक़ाफ़ती) पर पूरा क़ब्ज़ा रहा है जिसके नतीजे में उन्हों ने पॉलिसियों को अपने फ़ेवर में हमेशा असरअंदाज़ किया है और पसमान्दा मुसलमानों को हमेशा हाशिये पर रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा. मसलन, जब कभी मुस्लिम समाज के सबसे पिछड़ों (दलित मुसलमान) को मुसबत कार्रवाई (affirmative action) के ज़रिये, तरक़्क़ी की सहूलतों तक उनकी रसाई बढ़ाने और मसावात को फ़रोग़ देने के लिए कोई कारगर टूल (पढ़िये 1950 के प्रेसीडेनशियल ऑर्डर की वापसी) की बात की जाती है तो ये तब्क़ा—तब्क़-ए-अशराफ़ (सवर्ण मुसलमान) टोटल मुस्लिम रिज़र्वेशन [टी॰एम॰आर॰] जैसी कम्यूनल मांग उठा कर पूरे मूवमेंट में ख़लल डालने की, सैबोटाज करने की कोशिश करते हैं. चुनाँचे, हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज और इन्स्टीट्यूशन्स का डेमोक्रेटाईज़ेशन नागुज़ीर है, और इस अमल के लिए अशद ज़रूरी है पसमान्दा मुसलमानों की सियासी इक़्तेदार में उनकी जायज़ हिस्सेदारी.
मार्केटिंग गुरु फ़िलिप कॉटलर (Philip Kotler) नें टार्गेट मार्केट्स और सेगमेंटेशन (target market and segmentation) का बुनियादी तसव्वुर (core concept) दिया. उनका कहना था कि मार्केटर को शुरुवात यूँ करनी चाहिए—पहले वह मार्केट को कई हिस्सों में बांटे, जिसको उन्हों ने सेगमेंटेशन करना कहा; फिर जिस सेगमेंट में ज़्यादा मवाक़े (opportunities) हों, उसे वह टार्गेट करे. अगर आप इस तमसील (analogy) से देखें तो हिंदुस्तान का हुक्मरान तब्क़ा—जो सवर्ण मुसलमान और अशराफ़ हिन्दुओं पर मबनी है—ने मार्केटिंग के इस फ़ण्डे (फंदे भी!) को अच्छी तरह से समझ लिया है. इसने पहले हिंदुस्तानी मुसलमानों के मुद्दों—रोज़गार, ग़रीबी, मसावात, समाजी-ओ-इक़्तसादी नाबराबारी, समाजी इंसाफ़ और मज़हबी तअस्सुब (communalism) वग़ैरा वग़ैरा—को मुख़्तलिफ़ सेगमेंट में बांटा, फिर एक ऐसा  सेगमेंट चुना जो उसे ज़्यादा मवाक़े फ़राहम करता हो. ज़ाहिर इसके लिए उसने सेकुलरिज़्म–कम्यूनलिज़्म का मुद्दा चुना क्यूंकि इससे उनके तब्क़ाती मफ़ादात (class interest) पूरे होते हैं. उनके ये तब्क़ाती मफ़ादात दो तरीक़ों से पूरे होते हैं. पहला यह कि, सेक्युलरिज़्म–कम्यूनलिज़्म के इस डिबेट में समाजी इंसाफ़ और मुआशरे के अंदरूनी तज़ादात (internal conflicts) जैसे मुद्दे पसे पुश्त चले जाते हैं, दाख़िली जम्हूरियत (internal democracy) का मुद्दा पीछे ढकेल दिया जाता है इस तरह स्टेटस कू (status quo) बना रहता हैवे अपने अपने ओहदों और मक़ाम पर फ़ाईज़ रहते हैं, समाजी निज़ाम ज्यों का त्यों बना रहता है—समाज के मुख़्तलिफ़ इन्सटीट्यूशन (इदारों) पर उनकी पकड़ न सिर्फ़ बनी रहती है बल्कि और मज़बूत भी हो जाती है. दूसरे यह कि, सेक्युलरिज़्म–कम्यूनलिज़्म के खेल में समाज के किन लोगों को फ़ायदा होता है? कौन हैं वो लोग? आख़िर सेक्युलरिज़्म–कम्यूनलिज़्म का जिन्न चुनाव के ही दिनों में, क्यूँ बाहर निकाल आता है? और भाई इसका इलाज है भी या नहीं! पहले तीन सवालों के जवाब से आप बख़ूबी वाक़िफ़ होंगे; फिर भी , कुछ लोग/एन॰जी॰ओ॰ चॅंपियन्स ऑफ माइनोरिटी पॉलिटिक्स बने हुए हैं और अपने कारोबार को बख़ूबी मुनज़्ज़्म तरीक़े से चला रहे हैं. अब सवाल उठता है कि कम्यूनलिज़्म के भूत को कैसे भगाया जाए? कम्यूनलिज़्म को शिकस्त देने का सिर्फ़ वाहिद रास्ता है—सारे धर्मों/मज़हबों की कमज़ोर जातियों की बहुजन एकता! सारे मज़ाहिब (धर्मों) की कमज़ोर ज़ातों की एकता, साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक विमर्श को कमज़ोर बनाएगी ही नहीं बल्कि, यह सेक्युलरिज्म की नयी व्याख्या भी करेगा.


चुनाँचे, ज़रूरत इस बात कि है कि दलित-मुसलमान और पसमान्दा-हिन्दुओं के बीच एकता क़ायम की जाए और तब्क़-ए-अशराफ़िया (हुक्मरान तब्क़ा) के मार्केटिंग के फंदे को ध्वस्त किया जाय.
लेनिन नें अपने मज़मून जदलियात के सवाल के बारे में कहा है—किसी एक कुल की दो हिस्सों में तक़सीम और उसके मुताज़ाद अजज़ा का वक़ूफ़... उन्हों ने मज़ीद कहा—जदलियात दरअस्ल उस तज़ाद का मुताअला है जो अशिया की माहियत में मौजूद होता है.
माद्दी जदलियात के काएनाती तसव्वुर की रु से किसी शै की नशोनुमा को समझने के लिए हमे उसका मुताअला अंदर से और दूसरी अशिया के साथ उसके ताल्लुक़ात से करना चाहिए. बअल्फ़ाज़े दीगर अशिया की नशोनुमा को उनकी दाख़िली और ज़रूरी हरकत की ज़ात के तौर पर देखना चाहिए, जबकि हर शै अपनी हरकत में अपने गिर्द-ओ-पेश अशिया से बाहमी तौर पर वाबस्ता होती है और उनपर बाहमी तौर पर असरअन्दाज़ होती है. किसी शै की नशोनुमा का बुनियादी सबब ख़ारिजी नहीं बल्कि दाख़िली होता है, ये सबब उस शै के अंदर की तज़ादियात में मुज़्मिर होता है.


समाज में तब्दीलियाँ ज़्यादातर समाज के दाख़िली तज़ादात की नशोनुमा की वजह से होती हैं, यानी पैदावारी क़ूवतों और पैदावारी रिश्तों के दरमियान तज़ाद, तब्क़ात के दरमियान तज़ाद, क़दीम और जदीद के दरमियान तज़ाद, ये उन तज़ादात की नशोनुमा ही है जो समाज को आगे बढ़ाती है और नए समाज के हाथों पुराने समाज के ख़ात्मे के लिए क़ूवत मुहय्या करती है. क्या माद्दी जदलियात ख़ारिजी असबाब को नज़रअंदाज़ कर देती है? हरगिज़ नहीं. इसकी रु से ख़ारिजी असबाब तब्दीली की शर्त होते हैं और दाख़िली असबाब तब्दीली की बुनियाद होते हैं, और ख़ारिजी असबाब दाख़िली असबाब के ज़रिए ज़ेरे अमल आते हैं. 
हिन्दुस्तान का मुस्लिम समाज बहुत ही ग़ैरमसावी [unequal] समाज है. यहाँ लोगों के बीच और मुख़्तलिफ़ ज़ातों/तबक़ों के बीच समाजी, सियासी और इक़्तसादी नाबराबरी है जो पुश्त दर पुश्त बरक़रार रहती है. पुश्त दर पुश्त बरक़रार रहने वाली इस नाबराबरी को inequality trap कह सकते हैं. इस inequality trap को poverty trap की तमसील [analogy] से समझ सकते हैं; जिस तरह poverty trap बताता है कि ग़रीब इसलिए ग़रीब हैं क्यूँकि वो ग़रीब हैं, ठीक इसी तरह inequality trap का तसव्वुर बताता है कि ग़रीब इसलिए ग़रीब हैं क्यूँकि अमीर अमीर हैं.

समाज का बरसरे इक़्तदार तबक़ा समाज के मुख़्तलिफ़ इंस्टीट्यूशन्स पर अपनी पेशवाई (hegemony) और पकड़ को मज़बूत बनाए रखते हुए बराबरी के तीनों महवर (axes)—इक़्तसादी (economic), समाजी (social) और सियासी (political)—से ख़ास तबक़े को इक़्तसादी नाबराबरी, सोशल एक्सक्लूश्ज़्न और सियासी हाशियाबंदी (marginalisation) जैसे हरबों से दलित—पसमान्दा—मेहनतकश तबक़ों को मुसलसल नाबराबरी के जाल में उलझाए रखते हैं.
मिसाल के तौर पर नेशनल नमूना सर्वेक्षण (NSS) का 61वां राउंड (61 Round) बताता है कि हिन्दू ओ॰बी॰सी॰ का महाना फ़ीकस अखरजात (मंथली परकैपिटा एक्स्पेंडीचर/एम॰पी॰सी॰ई॰) रु 620 है और मुस्लिम ओ॰बी॰सी॰ का रु 605 है जबकि मुस्लिम अगड़ी (सामान्य) जाति का रु 633 हैं इस तरह मुस्लिम अशराफ़ आमदनी के लेहाज़ से न सिर्फ़ पसमान्दा मुस्लिम (मुस्लिम ओ॰बी॰सी॰) से आगे है बल्कि वो हिन्दू ओ॰बी॰सी॰ से भी आगे है. और जहां तक समाजी मोर्चे की बात है तो यह बात ढकी-छुपी नहीं कि यह सिर्फ़ कहने को है कि एक सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ आयाज़, न कोई बंदा रहा न बंदा नवाज़, मस्जिद की चौखट पार करते ही महमूद महमूद हो जाता है और बंदा नवाज़ बंदा नवाज़. यह शेर दलित–पसमान्दा मुसलमानों के लिए मात्र छलावा रहा है. एक सय्यद के लिए एक हलालख़ोर (भंगी) उतना ही अछूत है जितना एक ब्राहमण के लिए एक हिन्दू भंगी. सियासत में हिस्सेदारी का मुआमला तो और भी दीगर गूँ है – एक अध्ययन के मुताबिक़ अगर पहली से लेकर चौदहवीं लोकसभा की फेहरिस्त उठा कर देखें तो पाएंगे कि तब तक चुने गए सभी 7,500 प्रतिनिधियों में 400 मुसलमान थे; इन 400 में 340 अशराफ़ और केवल 60 पसमान्दा तबक़े से थे. अगर भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी की 13.4 फीसद (जनगणना, 2001) है तो अशराफ़िया आबादी 2.01 फीसद (जो कि मुसलमान आबादी के 15 फीसद हैं) के आसपास होगी जबकि लोकसभा में उनकी  नुमाइंदगी 4.5 (340/7500) प्रतिशत है जो कि उनकी आबादी प्रतिशत के दोगुने से भी ज्यादा है. वहीँ दूसरी ओर पसमान्दा मुसलमानों की नुमाइंदगी, जिनकी आबादी 11.4 फीसद है, महज़ 0.8 फीसद (एक फीसद से भी कम) है. भारत में मुसलमानों की आबादी के मुताबिक़ कुल सांसद कम से कम एक हज़ार होने चाहिए थे. इसलिए सिर्फ़ चार सौ सांसदों की मौजूदगी से लगता है कि मुसलमानों की भागीदारी मारी गई है, मगर आंकड़ों का ठीक से मुआयना करने पर देखेंगे कि अगड़े मुसलमानों (अशराफ़) को तो उनकी आबादी के दुगुने से भी ज्यादा भागीदारी मिली है. ये तो पिछड़े (पसमान्दा) मुसलमान हैं जिनकी हिस्सेदारी मारी गयी है.


अब सवाल उठता है कि, inequality trap से निजात कैसे मिले? तो जनाब, बराबरी के तीनों महवर (axes)—इक़्तसादी (economic), समाजी (social) और सियासी (political) के लिए तीन टूल्स—रीडिस्ट्रिब्यूशन (redistribution), रिकगनीशन (recognition) और पार्टीसीपेशन (participation) की ज़रूरत दरकार है. इक़्तसादी नाबराबरी को दूर करने के लिए वसाएल (resources) का रीडिस्ट्रिब्यूशन (redistribution) करना होगा, मसलन लैंड रेफ़ोर्म (land reform), रोज़गार की गारंटी व फ़राहमी वग़ैरा. समाजी मसवात के लिए अशद ज़रूरी है कि दलित व पसमान्दा को समाजी रिकगनीशन मिले और इसके लिए समाज को ज़्यादा से ज़्यादा डेमोक्रेटाइज़ करने कि ज़रूरत है और पसमान्दा तब्क़ात को सियासी (एलेक्टोरल के साथ साथ नॉन-एलेक्टोरल) हिस्सेदारी उनके आबादी के तनासुब (proportion) में दी जाए.
पिछले हफ़्ते, मेरे एक दोस्त, जो यहीं जे॰एन॰यू॰ में रिसर्च कर रहे हैं, कहने लगे कि—मुसलमानों में कोई ज़ात-पात नहीं. यह तो सिर्फ़ गाँव तक ही महदूद है. शहर में तो ये गुज़रे ज़माने की बात है; और अगर है भी  तो उसकी जकड़न उतनी मज़बूत नहीं वग़ैरा वग़ैरा. मैंने उनसे अर्ज़ कियाजनाब ऐसा जजमेंटल स्टेटमेंट देने से पहले एक छोटी सी एम्पिरिकल एनालिसिस करलें फ़िर किसी नतीजे पर पहुँचे. सारी बात इसी छोटे से मुताअले से वाज़ेह हो जाएगी, इसके लिए कोई बहुत बड़ी रिसर्च की ज़रूरत नहीं. अगर आप ने थोड़ा-बहुत रिसर्च मेथड्स पढ़ा हो अगर न भी पढ़ा हो तो कोई बात नहीं बस आप इतना करें कि आप, सैंपल के तौर, इस शहर के किसी हिस्से या मोहल्ले को रैंडमली चुन लें फिर यह देखने की कोशिश करें कि—क्या नाई का काम, मोची का काम, धोबी, दर्ज़ी या सफ़ाई का काम अशराफ़—शेख़, सय्यद, मुग़ल, पठान—कर रहा है? अगर जवाब मुसबत (हाँ) में मिले तो या माना जा सकता है कि शहरों के मुसलमानों में ज़ात-पात की जकड़न उतनी मज़बूत नहीं.

एक हफ़्ते हो गए हैं उनका तो कोई अता-पता नहीं [अमीर ख़ुसरो के लफ़्ज़ों में—...न आप आए न भेजी चिठियाँ]. बहेरहाल, पर इतना तो ज़रूर है कि मुन्दरज़ा बाला (written above) सवाल का जवाब नफ़ी (नहीं) में मिलने के बहुत ही हाई चांसेज़ हैं....