Friday, October 25, 2013

पिछले हफ़्ते, मेरे एक दोस्त, जो यहीं जे॰एन॰यू॰ में रिसर्च कर रहे हैं, कहने लगे कि—मुसलमानों में कोई ज़ात-पात नहीं. यह तो सिर्फ़ गाँव तक ही महदूद है. शहर में तो ये गुज़रे ज़माने की बात है; और अगर है भी  तो उसकी जकड़न उतनी मज़बूत नहीं वग़ैरा वग़ैरा. मैंने उनसे अर्ज़ कियाजनाब ऐसा जजमेंटल स्टेटमेंट देने से पहले एक छोटी सी एम्पिरिकल एनालिसिस करलें फ़िर किसी नतीजे पर पहुँचे. सारी बात इसी छोटे से मुताअले से वाज़ेह हो जाएगी, इसके लिए कोई बहुत बड़ी रिसर्च की ज़रूरत नहीं. अगर आप ने थोड़ा-बहुत रिसर्च मेथड्स पढ़ा हो अगर न भी पढ़ा हो तो कोई बात नहीं बस आप इतना करें कि आप, सैंपल के तौर, इस शहर के किसी हिस्से या मोहल्ले को रैंडमली चुन लें फिर यह देखने की कोशिश करें कि—क्या नाई का काम, मोची का काम, धोबी, दर्ज़ी या सफ़ाई का काम अशराफ़—शेख़, सय्यद, मुग़ल, पठान—कर रहा है? अगर जवाब मुसबत (हाँ) में मिले तो या माना जा सकता है कि शहरों के मुसलमानों में ज़ात-पात की जकड़न उतनी मज़बूत नहीं.

एक हफ़्ते हो गए हैं उनका तो कोई अता-पता नहीं [अमीर ख़ुसरो के लफ़्ज़ों में—...न आप आए न भेजी चिठियाँ]. बहेरहाल, पर इतना तो ज़रूर है कि मुन्दरज़ा बाला (written above) सवाल का जवाब नफ़ी (नहीं) में मिलने के बहुत ही हाई चांसेज़ हैं....
मज़ारों—मुजाविरों—सज्जादानशीनों—गद्दीनशीनों—ख़ानक़ाहों ने हिन्दुस्तानी मुसलमानों को लगातार पस्ती में रखा है; ये तब्क़ा हमेशा बरसरे इक़्तदार तब्क़ा, हुक्मरान तब्क़ा से हमेशा या तो जुगलबंदी की है, और या दस्त-बस्ता दुम हिलाने वाले अंदाज़ से पाबोसी की है। और अब इस नियो-लिबरल दुनियाँ में जब मल्टी-नेशनल्ज़ की इज़ारदारी ज़ोरों पर है तो ये उनके प्रोडक्टस के प्रमोशन और ऐडवरटीज़मेंट में लगे हुए हैं। मसलन, अब तो क़रीब-क़रीब ये आम मश्गिला बन गया है—किसी फ़िल्म के रिलीज़ होने से पहले उसके अदाकार मय डाइरेक्टर और प्रोड्यूसर के अक्सर दरगाहों पर पहुँचते हैं और अपनी फ़िल्म का प्रमोशन करते हैं और नवाज़े जाते हैं। रही बात हुक्मरान तब्क़े के सामने दुम हिलाने की तो बी॰बी॰सी॰ की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि कैसे मध्‍यप्रदेश की भाजपा सरकार नें बाक़ायदा छह-सात रेलगाड़ियों के ज़रिये, सरकारी ख़र्च पर मुस्लिम बुजुर्गो को अजमेर शरीफ़ की ज़ियारत करवाई है (सनद रहे कि जितने ज़्यादा ज़ाएरीन आएंगे उतना ही ज़्यादा रेवेन्यू जेनरेट होगा)। ये शायद उस बात का इनाम है जो यहाँ (अजमेर शरीफ़) के ख़ुद्दामों ने पिछले दिनों आर॰एस॰एस॰ के गणवेश धारी कार्यकर्ताओं (गुंडों) का ख़ैरमक़्दम (स्वागत) फूल बरसा कर किया था।
मशहूर ओ मारूफ़ माहिर-ए-सियासियात (political scientist) फ्रांसिस फुकुयमा (Francis Fukuyama) ने अपने एक आर्टिक्ल सोशल कैपिटल, सिविल सोसाइटी एण्ड डेवलपमेंट (Social capital, civil society and development)—और दीगर तस्नीफ़ात में भी—रेडियस ऑफ ट्रस्ट (radius of trust) की इस्तलाह का इस्तेमाल किया है। इन तस्नीफ़ात (writings) में, फुकुयमा नें बॉण्डिंग (bonding) के नतीजे में रेडियस ऑफ ट्रस्ट के महदूद हो जाने और सियासी सतह पर एक वर्टिकल पैट्रनेज सिस्टम(vertical patronage system) के खड़े हो जाने का ख़दशा ज़ाहिर किया है। उनका मानना है कि इस सिस्टम में सिर्फ़ उसी के गिर्द-ओ-नवाह (आवाह क्षेत्र) में रहने वाले लोग ही मुस्तफ़ीद (लाभान्वित) हो सकते हैं, दूसरे नहीं।
इसी बॉण्डिंग के हवाले से रोबर्ट पटनम (Robert Putnam) ने अपनी किताब बॉलिंग अलोन(Bowling Alone) में समाजी सरमाया (सोशल कैपिटल) के दोनों पक्षों—बॉण्डिंगऔर ब्रिजिंग (bridging) पर बात करते हुए फुकुयामा के रेडियस ऑफ ट्रस्ट को मौज़-ए-गुफ़्तगू बनाया है। बॉण्डिंग से यक़ीन ओ एतमाद (trust) का दायरा तंग होता है लेकिन ब्रिजिंगका अमल इसको और वुसअत (विस्तार) देता है। यही तौसीअ (विस्तार) जम्हूरियत के अमल को और मज़बूती देती है। समाजी सरमाया को ज़्यादा ताक़तवर और क़ादिर (समर्थ) बनाने के लिए बॉण्डिंगऔर ब्रिजिंग का एक साथ बना रहना ज़रूरी है। बॉण्डिंग मुआशरे और समाज में हाशिये पर खड़े लोगों को एकजुट और ऑर्गनाइज़ करने का काम करता है तो ब्रिजिंगमुख़्तलिफ़ कम्यूनिटीज़ के बीच ज़रूरी मुद्दों पर आमराय और हमआहंगी (coordination) की तरफ़ ले जाता है। पसमान्दा डिसकोर्स इसी बॉण्डिंगऔर ब्रिजिंगकी ज़िंदा जावेद मिसाल है और यह एक पाएदार समाजी सरमाए की तख़्लीक़ करने में एक कारगर रोल अदा करता है। यह डिसकोर्स मुंदरजा ज़ैल (निम्नलिखित) चार तरीक़ों  से रेडियस ऑफ ट्रस्ट को और वुसअत (विस्तार) देता है:
1.     इसमें डाईवर्सिटी के लिए रवादारी (tolerance) का जज़्बा है,
2.     इसमे डाईवर्सिटी के लिए क़ुबूलियत (acceptance)और रवादारी ही नहीं, मसावी अहमियत व तरजीह (equal weightage) की भी क़ुबूलियत मौजूद है;
3.     यह डिसकोर्स रिलेटिविज़्म का डिसकोर्स  नहीं है जो एक के मुक़ाबले दूसरे की दर्जाबंदी करता हो बल्कि मुख़्तलिफ़ बॉंडिंगस हो एकसाथ देखता है; और
4.     इसकी ज़बान डाइलॉग,मिलाप के साथ साथ तनक़ीदऔर इण्ट्रोस्पेकशन की है।


चुनाँचे, पसमान्दा डिसकोर्स, दौरे जदीद का एक अहम डिसकोर्स है जो दाख़िली जम्हूरियत के अमल को मज़बूती देता है और समाजी इंसाफ़ के लिए रास्ता हमवार करता है।

Friday, August 30, 2013

समाजी इंसाफ़ (social justice) और इकनॉमिक वेल-बीइंग (well-being) के लिए ज़रूरी है कि समाज में स्ट्रकचरल चेंज लाया जाए, और यही तबदीली—स्ट्रकचरल चेंज और मेयार-ए-ज़िन्दगी (standard of living) में बेहतरी—ही, दरअस्ल, तरक़्क़ी (development) है.
सियासी आज़ादी के सिर्फ़ उसी वक़्त कुछ माने होते हैं जब की लोगों को तरक़्क़ीयाती सरगरमियों के नतीजे में समाजी इंसाफ़ मिले और उनकी ज़िंदगी पहले के मुक़ाबले में बेहतर हो. ज़राअत (agriculture), सिनअत (industry), साइन्स, टेक्नोलोजी, सेहत, तालीम, ग़र्ज़ कि हर शोअबा-ए-ज़िन्दगी में हमारी पॉलिसियां इसी उसूल के तहेत वज़अ कि गईं हों और पाए-तक्मील को पहुंचायी गईं हों. अब सवाल उठता है कि इन पॉलिसियों को बनाता कौन है? एक मुनज़्ज़म मईशत (economy) में पॉलिसियों को बनाने में इन्सटीट्यूशन (इदारों) का अहेम किरदार होता है.
माहीरीन-ए-इक़्तसादियात (economists) और सियासी-ओ-समाजी साइन्सदानों (social and political scientists) के बीच, एक तरह से, यह इत्तेफाक़े राय है कि डगलस नॉर्थ (Douglas North) का यह मफ़रूज़ा—एक मुआशरे की समाजी, इक़्तसादी, क़ानूनी और सियासी तंज़ीमें यानी इसके “इदारे” (“institutions”) इसकी इक़्तसादी कारकरदगी (performance) का बुनियादी उंसुर है. इन्स्टीट्यूशन लिज़्म की सारी बहेस, मोटे तौर पर, दो मफ़रुज़ों (propositions) पर मुश्तमिल है: अव्वल, इदारे माने रखते हैं या यूँ कहें कि इन से फ़र्क़ पड़ता हैवो मेयार (standard), अक़ाएद (belief) और आमाल (actions) को मुतास्सिर करते हैं, लिहाज़ा वो नताएज (outcomes) की तश्कील करते हैं. दूसरे, इदारे एण्डोजेनस (endogenous) हैं—उनकी शकल और उनके कामकाज उनके ज़हूर (emergence) और बक़ा (endurance) के हालात पर मुनहसर होते हैं. मतलब यह कि, मुआशरे का समाजी निज़ाम और दीगर इन्स्टीट्यूशन्स एकदूसरे से असरअंदाज़ भी होते हैं और एकदूसरे को असरअंदाज़ भी करते हैं. बअल्फ़ाज़े दीगर, समाजी इंसाफ़ ओ तरक़्क़ी के लिए समाज और इसके इन्स्टीट्यूशन्स को ज़्यादा से ज़्यादा डेमोक्रेटाईज़ करना होगा.

तारीख़ी एतबार से, हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज में, तब्क़-ए-अशराफ़ का इन्स्टीट्यूशन्स (समाजी, मआशी और सक़ाफ़ती) पर पूरा क़ब्ज़ा रहा है जिसके नतीजे में उन्हों ने पॉलिसियों को अपने फ़ेवर में हमेशा असरअंदाज़ किया है और पसमान्दा मुसलमानों को हमेशा हाशिये पर रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा. मसलन, जब कभी मुस्लिम समाज के सबसे पिछड़ों (दलित मुसलमान) को मुसबत कार्रवाई (affirmative action) के ज़रिये, तरक़्क़ी की सहूलतों तक उनकी रसाई बढ़ाने और मसावात को फ़रोग़ देने के लिए कोई कारगर टूल (पढ़िये 1950 के प्रेसीडेनशियल ऑर्डर की वापसी) की बात की जाती है तो ये तब्क़ा—तब्क़-ए-अशराफ़ (सवर्ण मुसलमान) टोटल मुस्लिम रिज़र्वेशन [टी॰एम॰आर॰] जैसी कम्यूनल मांग उठा कर पूरे मूवमेंट में ख़लल डालने की, सैबोटाज करने की कोशिश करते हैं. चुनाँचे, हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज और इन्स्टीट्यूशन्स का डेमोक्रेटाईज़ेशन नागुज़ीर है, और इस अमल के लिए अशद ज़रूरी है पसमान्दा मुसलमानों की सियासी इक़्तेदार में उनकी जायज़ हिस्सेदारी.

Tuesday, February 12, 2013

बारहवीं पंचवर्षीय योजना और जन-स्वास्थ्य


बारहवीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे में भारत के जन-स्वास्थ्य की समस्याओं को स्वीकार करने के लिए सराहना की जानी चाहिए. इस मसौदे की ख़ास बात यह है कि इसमें व्यापक स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है; और साथ ही, यह संचारी रोगों, निवारक स्वास्थ्य परिचर्या तथा ग्रामीण स्वास्थ्य परिचर्या का उन्नयन इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैण्डर्ड (आई॰पी॰एच॰एस॰) मानकों के अनुरूप करने के लिए ज़िले को स्वास्थ्य सेवाओं की योजना, प्रशिक्षण और सेवा प्रदाय के लिए इकाइयों के रूप में देखता है. इस ड्राफ्ट में पूंजी निवेश और मानव संसाधन अंतराल को पाटने की आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है. इन प्रस्तावों की पूर्ति के लिए अपेक्षित पूंजी निवेश की प्रतिबद्धताओं के बारे में थोड़ा संशय ज़रूर है. इस संशय का कारण यह कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र व राज्यों में एक साथ वर्ष 2006-07 में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जी॰डी॰पी॰) के एक प्रतिशत से कम व्यय को आगामी वर्षों में बढ़ाकर 2 प्रतिशत से 3 प्रतिशत करने की पुरज़ोर वकालत की गयी थी और यह लक्ष्य अभी भी आकाश कुसुम बना हुआ है. गरचे, मसौदा का दावा है कि ग्यारहवीं योजना के अंत तक—2011-12 बजट अनुमान के आधार पर—स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय के सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 प्रतिशत तक पहुँचने की संभावना है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय के रुझानों को देखते हुए इस दावे को पूरा होने मे संशय है. हालांकि कुल स्वास्थ्य बजट बढ़ाना योजना आयोग के दायरे में नहीं है, पर यह पूंजी निवेश के संदर्भ में ठोस क़दम तो उठा ही सकता है क्योंकि पूंजी निवेश का बड़ा हिस्सा योजना आयोग के ही ज़रिए आता है. गोकि, मसौदा शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य परिचर्या की कमी मानता है, फिर भी एक वैध आशंका है कि उपचारात्मक स्वास्थ्य परिचर्या की ज़िम्मेदारी को निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया जाएगा; जबकि निवारक और कम गुणवत्ता की स्वास्थ्य परिचर्या सार्वजनिक प्रणाली के माध्यम से प्रदान की जाएगी.

मसौदे का प्रस्ताव है कि जहाँ स्वास्थ्य परिचर्या का प्रावधानीकरण बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र के माध्यम से किया जाता है, वहाँ एक सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य प्रणाली खड़ी की जाए. उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह स्वास्थ्य ने इस बात की पुरज़ोर वकालत की है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के वित्तपोषण के लिए कर के साथ-साथ बीमा आधारित प्रणाली भी प्रयोग करना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि बीमा आधारित प्रणाली सिर्फ़-और-सिर्फ़ तभी प्रभावी हो सकती है जब स्वास्थ्य सेवाओं के विनयमन और प्रावधानीकरण में सरकार की महति भूमिका हो. मिसाल के तौर पर, थाईलैंड और कोस्टारिका जैसे देश अपनी मजबूत सार्वजनिक प्रणाली की ही बिना पर, बीमा आधारित प्रणाली का प्रयोग कर के, उचित क़ीमत पर व्यापक स्वास्थ्य परिचर्या कवरेज सुनिश्चित करने में सफल रहे हैं. परंतु भारत में, जहाँ सार्वजनिक प्रणाली व सार्वजनिक सेवाओं का प्रावधानीकरण काफ़ी कमज़ोर है वहाँ बीमा आधारित प्रणाली के सफल होने की प्रायियकता अत्यंत क्षीण नहीं तो कम ज़रूर है. इस क्रम में, बीमा आधारित प्रणाली के सफल होने के लिए, करना तो यह चाहिए कि पहले हम एक मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली खड़ी करें जो अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने मे सक्षम हो फिर सोंचे कि वित्त पोषण की कौन सी प्रणाली काम में लाई जाए. दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन यह भी बताते हैं कि, ख़ास तौर पर विकासशील व निम्न आय वाले देशों में स्वास्थ्य बीमा ने कोई क़बीले क़बूल नतीजे नहीं दिये हैं. स्वीडन वासी विख्यात स्वास्थ्य अर्थशास्त्री एकमैन, अपने निम्न-आय वर्गीय देश—ज़ाम्बिया के अध्ययन से इस नतीजे पर पहुँचे कि स्वास्थ्य बीमा, आम समझदारी के विपरीत, विपत्तिपूर्ण भुगतान के जोखिम के ख़िलाफ़ किसी भी तरह से वित्तीय सुरक्षा प्रदान नहीं करता है बल्किवास्तव में, बीमा इस जोखिम को और बढ़ाता है.

भारत में, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधानीकरण मे निजी क्षेत्र हावी है, पर यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर अल्प-विकसित और पूरी तरह से अनियमित है. साथ ही, इस क्षेत्र के प्रसार और वितरण, देखभाल की गुणवत्ता—या वास्तव में इसकी “क्षमता”—के बारे में बुनियादी आंकड़े तक उपलब्ध नहीं है. निजी क्षेत्र की प्रकृति को देखते हुए, बाज़ार विफलताएँ बड़े पैमाने पर होंगी और नैतिक जोखिम की समस्याएँ होने की भी प्रबल संभावना है; केरला इन समस्याओं—बाज़ार विफलता एवं नैतिक जोखिम (मॉरल हज़ार्ड) का जीता-जागता उदाहरण है. नैतिक जोखिम आगे चल कर लागत को तो बढ़ाएँगे ही और साथ में अनावश्यक और अनियमित प्रौद्योगिकियों के उपयोग को भी प्रोत्साहित करेंगे. वैश्विक अनुभव बताता है कि विनियमन की लागत, निजी क्षेत्र के वर्चस्व वाली स्वास्थ्य प्रणाली में, अमूमन, बीमा की कुल लागत का एक तिहाई है. अगर ऐसा हुआ तो, सरकार का विनियमन पर ख़र्च, वर्तमान में स्वास्थ्य ख़र्च से ज़्यादा होगा. ऐसे महंगे मॉडल को अपनाना, स्पष्ट रूप से, समझदारी नहीं है.

यद्द्पि निजी क्षेत्र को विनियमित करने के लिए बिल तैयार किया जा चुका है, तथापि यह गणना और सेवा के मूल गुणवत्ता के बारे में ही बात करता है, लेकिन लागत और तकनीकी से सम्बंधित मामले बिल में शामिल नहीं हैं. बढ़ते हुए जेबी (आउट ऑफ पॉकेट) ख़र्च का एक प्रमुख कारण है—जिसे मसौदे को अवश्य ही ध्यान मे रखना चाहिए—निजी क्षेत्र में लागत और प्रौद्योगिकियों का अनियमित उपयोग. साल दर साल, निराशाजनक रूप से, घटता बाल-लिंग अनुपात प्रौद्योगिकियों के अनियमित उपयोग की ही देन है. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि किस प्रकार, अक्सर डॉक्टर की शह पर, मरीज़ों को ग़ैर ज़रूरी जाँच व डाएग्नोसिस के लिए प्रोत्साहित, या यूँ कहें कि मजबूर, किया जाता है. प्रौद्योगिकियों का अनावश्यक इस्तेमाल, निश्चित तौर पर, लागत को बढ़ाता है. नई दिल्ली में पूरे शरीर की स्कैनिंग करने वाले केन्द्रों (फुल बॉडी स्कैनिंग सेंटर) की कुल संख्या लंदन में काम कर रहे सेंटरों की कुल संख्या के तीन से चार गुनी है, और मज़ेदार बात यह है कि नई दिल्ली के ये सभी केंद्र अच्छा और तेज़ कारोबार कर रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं मे लागत को कम करने और प्रौद्योगिकियों को विनियमित करने के लिए सक्षम होने के लिए, सरकार को, मज़बूत राजनीतिक इच्छा-शक्ति रखनी होगी. बारहवीं योजना, संस्थागत माध्यम के ज़रिये ऐसा करने का एक अवसर है. ब्रिटेन में, हालांकि, आंशिक रूप से ही, ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जिसने प्रौद्योगिकियों को विनियमित तथा लागत को कम किया है.

मसौदे में स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने के लिए पीपीपी या ग़ैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और भागेदारी बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर देता दिखाई देता है. दोनों­—पीपीपी और एनजीओ-ईकरण, दरअसल राज्य का अपनी भूमिका को संकुचित या पलटना (विथ्ड्रॉअल) करना है; ऐसा कोई प्रामाणिक अध्ययन नहीं है जो यह बताए कि ग़ैर-सरकारी संगठन अन्य संस्थाओं की अपेक्षा अधिक न्यायसंगत या अधिक कुशल हैं.

बीमा आधारित मॉडल की एक और स्पष्ट कमी यह है कि यह, आम तौर पर, वाह्य चिकत्सा (आउट डोर) रोग को कवर नहीं करता है. स्वास्थ्य पर जेबी ख़र्च (आउट ऑफ पॉकेट) का एक बड़ा हिस्सा दवा, जाँच व परीक्षण और चिकित्सक के परामर्श के रूप में होता है. सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में, दवा और जाँच का ख़र्च स्वास्थ्य पर जेबी ख़र्च का प्रमुख स्रोत हैं.

यह ड्राफ्ट, औषधि और चिकत्सीय जाँचों तक व्यापक पहुँच सुनश्चित करने की आवश्यकता की अनदेखी करता है. दवा की अबाध आपूर्ति की निश्चितता और भंडारण प्रणाली, और साथ ही, यूज़र फीस का उन्मूलन और दवा की आपूर्ति के लिए पर्याप्त धन आवंटन सहित कई मुद्दे हैं जो स्वास्थ्य परिचर्या की व्यापकता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. कई अफ्रीकी देशों आम जन तक स्वास्थ्य परिचर्या की व्यापकता को सुनिश्चित करने के लिए यूज़र फीस को अब वापस ले रहे हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी सुधार के बिना, लोगों—ख़ास करके ग़रीब लोगों—का रुझान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता. निजी क्षेत्र का बढ़ता हुआ उपयोग विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी है. देश के नीतिकार निजी क्षेत्र के उच्च प्रयोग को, निजीकरण को बढ़ाने और निजी क्षेत्र को अधिक राज्य सब्सिडी देने के लिए तर्क के रूप में प्रयोग करते हैं. जहाँ तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की बात है, यह दरअसल, चिकित्सा देखभाल के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को दी गयी सब्सिडी का ही एक रूप है, जो समाज के उन तबक़ों के बीच “प्रभावी मांग” पैदा करती है जिनकी निजी चिकित्सा परिचर्या तक पहुँच बहुत ही कम है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि आर॰एस॰बी॰वाई॰ के लिए सूचीबद्ध अस्पतालों में निजी क्षेत्र मुख्य रूप से है.

ऐसा प्रतीत होता है कि, बीमा आधारित मॉडल चिकित्सा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का हथकंडा है. दिलचस्प बात यह है कि बीमा आधारित मॉडल, एक ऐसा मॉडल है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में भी पूर्णरूपेणु काम नहीं करता है (राष्ट्रपति ओबामा ने टिप्पणी की है कि उनके देश को बीमा कंपनियों ने बंधक बना रखा है) और इसी मॉडल को अपनाने के लिए भारत जैसे देश—जहाँ ग़रीबी अत्यंत उच्च स्तर पर है, जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अनौपचारिक क्षेत्र में है—को सुझाव दिया जा रहा है. यह मॉडल प्रौद्योगिकियों के अत्यधिक और अनावश्यक उपयोग, नैतिक जोखिम की समस्याओं और उच्च लागत को बढ़ाता है.

सार्वजनिक सुविधाओं के प्रावधानीकरण के बीच, सामाजिक समानता का गंभीर मुद्दा भी क़ाबिले ग़ौर है. गोकि, इस मुद्दे को मज़बूती देने के लिए कोई आंकड़े नहीं हैं—वास्तव में इस डेटा की अत्यंत आवश्यकता है—निजी मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों एवं नर्सिंग होम आदि निजी-संस्थानों पर, बड़े पैमाने, पर उच्च जाति/वर्ग के लोगों का प्रभुत्व रहा हैं. इस प्रकार इन संस्थानों तक आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़ों, ग़रीबों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों और मुसलमानों, की न केवल रसाई कम है बल्कि ये संस्थाएं इन्हें सोशली एक्सक्ल्यूड भी कर रही हैं. इसलिए, ज़रूरत एक ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य परिचर्या प्रणाली की है जो सभी सेवाएँ—प्राथमिक से लेकर तृतीयक; निवारक से लेकर उपचारात्मक चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता सहित प्रावधानीकरण को दृढ़ बना सके. हम को महामारी विज्ञान के आँकड़े, निगरानी प्रणाली और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं आदि की भी अत्यंत ज़रूरत है. मुझे नहीं लगता कि, बारहवीं पंचवर्षीय योजना के इस मसौदे में, इन मुद्दों को उजागर करने के अवसर को गँवा दिया जाया जाए.

Wednesday, November 14, 2012

मुस्लिम अभ्यर्थियों के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट


वामपंथियों का कांग्रेसी पैंतरा

जेएनयू कैंपस में इन दिनों मुस्लिम अभ्यर्थियों को प्रवेश परीक्षाओं में 5 डेप्रीवेशन पॉइंट देने के लिए वामपंथियों के सभी संस्करण — अल्ट्रा-माओइस्ट  से लेकर संशोधनवादी-नवअवतरित वामपंथी छात्रसंगठन — कमरबंद हैं।  मज़ेदार बात तो यह है कि, इस क़िस्म के प्रोपोज़ल को लाने में सबसे पहले वह संगठन संगठन पेश-पेश था जिसका मानना था [है] कि स्कूल विशेष के ख़ास सम्प्रदायों के छात्रों को कहीं भी हांक कर लाया जा सकता है। सितम ज़रीफ़ी तो देखिये कि अब कैंपस के सारे संगठन इस मफ़रूज़े को अमल में लाने के लिए इस क़दर उत्साहित हैं कि वे इस बात को भूल गए हैं कि जेएनयू भारतीय संविधान परे नहीं है! अब सवाल यह है कि क्या वाक़ई में सारे संगठन इस हक़ीक़त से नावाक़िफ़ हैं या फिर मुसलमानों को बहलाने का कांग्रेसी नुस्ख़ा अपना रहे हैं?? इतना तो तय है कि, हमारे कॉमरेड इतने अज्ञानी नहीं हैं कि उनको इस बात की जानकारी न हो धर्म के आधार पर किसी क़िस्म का पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन न तो संवैधानिक और क़ानूनी तौर मुमकिन है और न ही सामाजिक न्याय के पैमाने पर उचित। तो फिर ये सारे हरबे सिर्फ़ कांग्रेसी पैंतरेबाज़ी नहीं तो और क्या है??

सभी के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट — समता और सामाजिक न्याय के पैमाने पर अनुचित तथा संवैधानिक रूप से अव्यावहारिक है

सामाजिक न्याय की तमामतर अवधारणाओं में, प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक जॉन राल्स की अवधारणा, शायद, सबसे प्रभावशाली है और इसको ख़ास अहमियत मिली है; अमर्त्य सेन भी अपने सामाजिक न्याय के नज़रिए में  जॉन राल्स से काफी हद तक इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। राल्स के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा वंचित व्यक्ति/समूह को सबसे अधिक लाभ मिलना चाहिए (जिससे कि, ख़राब स्थिति वालों को बेहतर स्थिति वालों के बराबर किया जा सके, मतलब यह कि, किसी भी प्रकार के लाभ के वितरण में ख़राब स्थिति वालों को ज़्यादा देना।) इतना तो साफ़ है  — और सामाजिक सच्चाई भी — कि मुस्लिम समाज हाईरेरिकल और जातिगत रूप से उतना ही असमान है जितना कि हिन्दू समाज। मुस्लिम को एक मोनोलिथ सोसाइटी समझना एक समाजशास्त्रिय ग़लती है। इसलिए सामाजिक न्याय व समता की दृष्टि से यह ज़रूरी है कि जो जितना ही ज़्यादा वंचित हो — उसे किसी क़िस्म के पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन का — उतना ही अधिक लाभ मिलना चाहिए।

मौजूदा संविधान के मुताबिक़ धर्म के आधार पर कोई भी पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन (आरक्षण) नहीं दिया जा सकता। आरक्षण का आधार केवल सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। तो धर्म के आधार पर किसी क़िस्म  आरक्षण असंविधानिक होगा, इसी आधार पर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट सहित उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यकों के साढ़े चार प्रतिशत के आरक्षण को ख़ारिज कर दिया था। अदालत का कहना था कि यह सब-कोटा देने का फैसला धार्मिक वजहों से लिया गया था। इसके पीछे और कोई आधार नहीं था। साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा की धर्म के आधार पर आरक्षण संविधान के ख़िलाफ़ है। तो फिर मुस्लिमों के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट की मांग करना मात्र छलावा नहीं तो क्या है? उसूलन तो होना यह चाहिए कि, कैंपस की सारी छात्र बिरादरी, ख़ासकर प्रोग्रेसिव फ़्रेटरनिटी को पिछड़े/पसमांदा मुसलमानों को उनके हक़ और इंसाफ़ दिलाने के लिए आगे आना चाहिए और इसके लिए ऐसी हिकमत-ए-अमली अख़तियार करनी चाहिए कि 5 डेप्रीवेशन पॉइंट का मुद्दा वाक़ई में क्लिंच हो जाए नाकि सिर्फ़ थोथरी बातें व बेकार की लफ्फ़ाज़ी..

Tuesday, November 15, 2011

यौमे इत्फ़ाल

दो दिन क़ब्ल, मुल्क में तमाम मानाये जाने वालों यौमयौमे आज़ादी, यौमे जम्हूरियत, यौमे ख़वातीन, यौमे बुज़ुर्गानकी शृंखला में यौमे इत्फ़ाल मनाया गया. मगर हक़ीक़त यह है कि यह 'यौम' भी तमाम दूसरे यौम के मानिंद सिर्फ़ एक रस्म अदायिगी भर था. दरहक़ीक़त, इत्फ़ाल का ताल्लुक़ मुल्क की तरक़्क़ी से है क्योँ कि यही इत्फ़ाल आगे चल कर मुल्क का एक अहम वसायल-इंसानी वसायल बनते हैं. नोबल प्राईज़ याफ़्ता माहिरे इक़्तसादियात गैरी बेकर की तमामतर तस्नीफ़ात इस बात की ताईद करती हैं कि कैसे इंसानी वसायल (बज़रिये तालीम--तरबियत) मुल्क--क़ौम की तरक़्क़ी के लिए निहायत ही ज़रूरी हैं. मगर साल-दर-साल ख़राब रिकार्ड के बावजूद यह शओबा अदम तवज्जही का शिकार है. सरकार सिर्फ़ आरटीई पास कर के अपना पल्ला झाड़ लेती है, जो की एक अलग बहस का मुद्दा है. हमारा मुल्क दुनिया के सबसे ज़्यादा पांच साल से कम उम्र के बच्चों की शरह--अमवात वाले मुल्कों में से एक है. हर बीस सेकंड में पांच बरस से कम उम्र का एक बच्चा हमारी सरज़मीन पर फ़ौत हो जाता है. और इस मुल्क के हुक्मरान ऐसे हैं कि ख़्वाब--ग़फ़लत से बेदार होने को तैयार नहीं है. अभी चंद रोज़ पहले मग़रबी बंगाल के अस्पतालों में मासूम बच्चों की हलाकत का सानेहा गुज़रा है. और यह मसला सिर्फ़ मग़रबी बंगाल का ही नहीं, बल्कि पूरे मुल्क का है. अगर मुल्क में मौजूद हेल्थ सिस्टम की ज़ुबुंहाली का तजज़िया किया जाए तो एक अजीब अफ़सोसनाक हक़ीक़त की दर्याफ़्त होती है. पब्लिक हेल्थ सिस्टम दोनोंतिब्बी और बह-तिब्बी अहलकारों की कामी से जूझ रहे हैं. अठ्ठारह फ़ीसद अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, अड़तीस फ़ीसदी अस्पताल बिना किसी लैबोरेटरी टेक्नीशियन के काम कर रहे हैं और सोलह फ़ीसदी अस्पतालों में फार्मेसिस्ट तक नहीं हैं. स्पेशलिस्ट डाक्टरों की तो और भी कमी है, तकरीबन पचास फ़ीसद से भी ज़्यादा अस्पतालों में स्पेशलिस्ट डाक्टर नहीं हैं. और जहाँ तक सेहत--आम्मा में सरकारी ख़र्च का मसला है तो उसमे भी हमारा मुल्क सबसे पीछे है, 2004-05 के आंकड़े बताते हैं की सेहत पर जीडीपी का एक फ़ीसदी से भी कम (0.97%) ख़र्च होता है. आलमी इदारा--सेहत (डब्ल्यू एच ) का कहना है कि हिन्दुस्तानी शहरियों में 70 फ़ीसद ऐसे हैं जो अपनी पूरी आमदनी दवा और इलाज--मुआल्जा पर सर्फ़ करने को मजबूर हैं. ज़ाहिर है इन में अक्सरियत उन लोगों कि है जो बेचारे बेहद ग़रीब हैं. अगर हुकूमत एहसान फ़रामोशी करे और बिलख़ुसूस जिन लोगों के बल बूते पर एक़तदार हासिल करती है करती है उनकी दादरसी की सिर्फ़ ये फ़िक्र कर लिया करे कि उन्हें पीने का साफ़ पानी, खाने-पीने के लिए मुतावाज़िन ग़िज़ा और रहने को साफ़ सुथरे माहौल में एक मकान की ज़मानत दे दे तो उन बीमारियों के लाहिक़ होने का ख़तरा ही टल जाएगा जो ग़ुरबतज़दह अवाम को भयानक ख़्वाब की तरह डराती रहती है. मगर रोना तो इसी बात का है. हुसूले आज़ादी के तिरसठ साल बाद भी हमारे मुल्क के बहुतेरे ईलाक़ों में पीने का साफ़ पानी है बिजली, सड़कें हैं अस्पताल, अलबत्ता मफ़ादपरस्ती और ज़रपरस्ती हर जगह है.

बच्चों की नाक़िस गिज़ाईयत को कम करना मुल्क के लिए एक बड़ा चैलेन्ज बन गया है. हिन्दुस्तान एक ऐसा वाहिद मुल्क है जहाँ के बच्चों में नाक़िस गिज़ाईयत का बार सबसे ज़्यादा है; और तो और, सब-सहारा मुल्कों से भी ज़्यादा है. तक़रीबन साठ मिलियन बच्चे कम वज़न हैं; पचास फ़ीसद से भी ज़्यादा एनीमिया का शिकार हैं; और भी पचास फ़ीसद से भी ज़ायद बच्चे किसी भी तरह की हिफाज़तकारी से इस्तसना हैं. इंटरनेश्नल फ़ूड पॉलिसी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) की हालिया जारी करदा रिपोर्ट 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2011' के मुताबिक़ 112 मुल्कों में हमारी पोज़िशन 67वीं है. हमारी पोज़िशन अपने जनूबी एशियाई पड़ोसियों-पाकिस्तान, श्रीलंका और चीन और सब-सहारा मुल्कों- रवांडा, लाईबेरिया, जबूती, मोज़ाम्बीक और सूडान से नीचे है. और जहाँ तक, नाक़िस गिज़ाईयत का मसला है तो माहीरेने गिज़ा बरुन और रूएल अपने मुताले में इस नतीजे तक पहुंचे के हिन्दुस्तान की पोज़ीशन, बच्चों की नाक़िस गिज़ाईयत के एतबार से 2006 में 119 मुल्कों में से 117 वीं थी मतलब कि नीचे से तीसरी पोज़ीशन.

बच्चों की हलाकत, ताग्ज़ियाह का मसला और बच्चा मज़दूरी ऐसे बुनयादी मसायेल हैं जिन से नित नए मसायेल पैदा होते रहते हैं और हुकूमत चंद एक मसायेल को भी हल नहीं कर पाती. बच्चों की तरफ़ से इस की लापरवाही का यह हाल है कि रज़ाकार तंज़ीमें मौक़ा--मौक़ा आवाज़ उठाएं तो इलाज मुआलिजा के नाम पर ग़रीबों को वह भी मिले जो कभी कभार भीख के टुकड़ों की तरह मिल जाता है. भूक ग़ुरबत के बारे में सोचिये तो अफ्रीक़ी मुल्कों का तसव्वुर उभरता है लेकिन ग़ौर कीजिए हम तो उनसे भी गए गुज़रे हैं!