Tuesday, February 12, 2013

बारहवीं पंचवर्षीय योजना और जन-स्वास्थ्य


बारहवीं पंचवर्षीय योजना के मसौदे में भारत के जन-स्वास्थ्य की समस्याओं को स्वीकार करने के लिए सराहना की जानी चाहिए. इस मसौदे की ख़ास बात यह है कि इसमें व्यापक स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है; और साथ ही, यह संचारी रोगों, निवारक स्वास्थ्य परिचर्या तथा ग्रामीण स्वास्थ्य परिचर्या का उन्नयन इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैण्डर्ड (आई॰पी॰एच॰एस॰) मानकों के अनुरूप करने के लिए ज़िले को स्वास्थ्य सेवाओं की योजना, प्रशिक्षण और सेवा प्रदाय के लिए इकाइयों के रूप में देखता है. इस ड्राफ्ट में पूंजी निवेश और मानव संसाधन अंतराल को पाटने की आवश्यकता को भी स्वीकार किया गया है. इन प्रस्तावों की पूर्ति के लिए अपेक्षित पूंजी निवेश की प्रतिबद्धताओं के बारे में थोड़ा संशय ज़रूर है. इस संशय का कारण यह कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में केंद्र व राज्यों में एक साथ वर्ष 2006-07 में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जी॰डी॰पी॰) के एक प्रतिशत से कम व्यय को आगामी वर्षों में बढ़ाकर 2 प्रतिशत से 3 प्रतिशत करने की पुरज़ोर वकालत की गयी थी और यह लक्ष्य अभी भी आकाश कुसुम बना हुआ है. गरचे, मसौदा का दावा है कि ग्यारहवीं योजना के अंत तक—2011-12 बजट अनुमान के आधार पर—स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय के सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 प्रतिशत तक पहुँचने की संभावना है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय के रुझानों को देखते हुए इस दावे को पूरा होने मे संशय है. हालांकि कुल स्वास्थ्य बजट बढ़ाना योजना आयोग के दायरे में नहीं है, पर यह पूंजी निवेश के संदर्भ में ठोस क़दम तो उठा ही सकता है क्योंकि पूंजी निवेश का बड़ा हिस्सा योजना आयोग के ही ज़रिए आता है. गोकि, मसौदा शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य परिचर्या की कमी मानता है, फिर भी एक वैध आशंका है कि उपचारात्मक स्वास्थ्य परिचर्या की ज़िम्मेदारी को निजी क्षेत्र के लिए छोड़ दिया जाएगा; जबकि निवारक और कम गुणवत्ता की स्वास्थ्य परिचर्या सार्वजनिक प्रणाली के माध्यम से प्रदान की जाएगी.

मसौदे का प्रस्ताव है कि जहाँ स्वास्थ्य परिचर्या का प्रावधानीकरण बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र के माध्यम से किया जाता है, वहाँ एक सार्वजनिक रूप से वित्तपोषित स्वास्थ्य प्रणाली खड़ी की जाए. उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह स्वास्थ्य ने इस बात की पुरज़ोर वकालत की है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के वित्तपोषण के लिए कर के साथ-साथ बीमा आधारित प्रणाली भी प्रयोग करना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि बीमा आधारित प्रणाली सिर्फ़-और-सिर्फ़ तभी प्रभावी हो सकती है जब स्वास्थ्य सेवाओं के विनयमन और प्रावधानीकरण में सरकार की महति भूमिका हो. मिसाल के तौर पर, थाईलैंड और कोस्टारिका जैसे देश अपनी मजबूत सार्वजनिक प्रणाली की ही बिना पर, बीमा आधारित प्रणाली का प्रयोग कर के, उचित क़ीमत पर व्यापक स्वास्थ्य परिचर्या कवरेज सुनिश्चित करने में सफल रहे हैं. परंतु भारत में, जहाँ सार्वजनिक प्रणाली व सार्वजनिक सेवाओं का प्रावधानीकरण काफ़ी कमज़ोर है वहाँ बीमा आधारित प्रणाली के सफल होने की प्रायियकता अत्यंत क्षीण नहीं तो कम ज़रूर है. इस क्रम में, बीमा आधारित प्रणाली के सफल होने के लिए, करना तो यह चाहिए कि पहले हम एक मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली खड़ी करें जो अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने मे सक्षम हो फिर सोंचे कि वित्त पोषण की कौन सी प्रणाली काम में लाई जाए. दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन यह भी बताते हैं कि, ख़ास तौर पर विकासशील व निम्न आय वाले देशों में स्वास्थ्य बीमा ने कोई क़बीले क़बूल नतीजे नहीं दिये हैं. स्वीडन वासी विख्यात स्वास्थ्य अर्थशास्त्री एकमैन, अपने निम्न-आय वर्गीय देश—ज़ाम्बिया के अध्ययन से इस नतीजे पर पहुँचे कि स्वास्थ्य बीमा, आम समझदारी के विपरीत, विपत्तिपूर्ण भुगतान के जोखिम के ख़िलाफ़ किसी भी तरह से वित्तीय सुरक्षा प्रदान नहीं करता है बल्किवास्तव में, बीमा इस जोखिम को और बढ़ाता है.

भारत में, स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधानीकरण मे निजी क्षेत्र हावी है, पर यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर अल्प-विकसित और पूरी तरह से अनियमित है. साथ ही, इस क्षेत्र के प्रसार और वितरण, देखभाल की गुणवत्ता—या वास्तव में इसकी “क्षमता”—के बारे में बुनियादी आंकड़े तक उपलब्ध नहीं है. निजी क्षेत्र की प्रकृति को देखते हुए, बाज़ार विफलताएँ बड़े पैमाने पर होंगी और नैतिक जोखिम की समस्याएँ होने की भी प्रबल संभावना है; केरला इन समस्याओं—बाज़ार विफलता एवं नैतिक जोखिम (मॉरल हज़ार्ड) का जीता-जागता उदाहरण है. नैतिक जोखिम आगे चल कर लागत को तो बढ़ाएँगे ही और साथ में अनावश्यक और अनियमित प्रौद्योगिकियों के उपयोग को भी प्रोत्साहित करेंगे. वैश्विक अनुभव बताता है कि विनियमन की लागत, निजी क्षेत्र के वर्चस्व वाली स्वास्थ्य प्रणाली में, अमूमन, बीमा की कुल लागत का एक तिहाई है. अगर ऐसा हुआ तो, सरकार का विनियमन पर ख़र्च, वर्तमान में स्वास्थ्य ख़र्च से ज़्यादा होगा. ऐसे महंगे मॉडल को अपनाना, स्पष्ट रूप से, समझदारी नहीं है.

यद्द्पि निजी क्षेत्र को विनियमित करने के लिए बिल तैयार किया जा चुका है, तथापि यह गणना और सेवा के मूल गुणवत्ता के बारे में ही बात करता है, लेकिन लागत और तकनीकी से सम्बंधित मामले बिल में शामिल नहीं हैं. बढ़ते हुए जेबी (आउट ऑफ पॉकेट) ख़र्च का एक प्रमुख कारण है—जिसे मसौदे को अवश्य ही ध्यान मे रखना चाहिए—निजी क्षेत्र में लागत और प्रौद्योगिकियों का अनियमित उपयोग. साल दर साल, निराशाजनक रूप से, घटता बाल-लिंग अनुपात प्रौद्योगिकियों के अनियमित उपयोग की ही देन है. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि किस प्रकार, अक्सर डॉक्टर की शह पर, मरीज़ों को ग़ैर ज़रूरी जाँच व डाएग्नोसिस के लिए प्रोत्साहित, या यूँ कहें कि मजबूर, किया जाता है. प्रौद्योगिकियों का अनावश्यक इस्तेमाल, निश्चित तौर पर, लागत को बढ़ाता है. नई दिल्ली में पूरे शरीर की स्कैनिंग करने वाले केन्द्रों (फुल बॉडी स्कैनिंग सेंटर) की कुल संख्या लंदन में काम कर रहे सेंटरों की कुल संख्या के तीन से चार गुनी है, और मज़ेदार बात यह है कि नई दिल्ली के ये सभी केंद्र अच्छा और तेज़ कारोबार कर रहे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं मे लागत को कम करने और प्रौद्योगिकियों को विनियमित करने के लिए सक्षम होने के लिए, सरकार को, मज़बूत राजनीतिक इच्छा-शक्ति रखनी होगी. बारहवीं योजना, संस्थागत माध्यम के ज़रिये ऐसा करने का एक अवसर है. ब्रिटेन में, हालांकि, आंशिक रूप से ही, ऐसी संस्थागत व्यवस्था है जिसने प्रौद्योगिकियों को विनियमित तथा लागत को कम किया है.

मसौदे में स्वास्थ्य परिचर्या प्रदान करने के लिए पीपीपी या ग़ैर-सरकारी संगठनों की भूमिका और भागेदारी बढ़ाने की ज़रूरत पर ज़ोर देता दिखाई देता है. दोनों­—पीपीपी और एनजीओ-ईकरण, दरअसल राज्य का अपनी भूमिका को संकुचित या पलटना (विथ्ड्रॉअल) करना है; ऐसा कोई प्रामाणिक अध्ययन नहीं है जो यह बताए कि ग़ैर-सरकारी संगठन अन्य संस्थाओं की अपेक्षा अधिक न्यायसंगत या अधिक कुशल हैं.

बीमा आधारित मॉडल की एक और स्पष्ट कमी यह है कि यह, आम तौर पर, वाह्य चिकत्सा (आउट डोर) रोग को कवर नहीं करता है. स्वास्थ्य पर जेबी ख़र्च (आउट ऑफ पॉकेट) का एक बड़ा हिस्सा दवा, जाँच व परीक्षण और चिकित्सक के परामर्श के रूप में होता है. सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में, दवा और जाँच का ख़र्च स्वास्थ्य पर जेबी ख़र्च का प्रमुख स्रोत हैं.

यह ड्राफ्ट, औषधि और चिकत्सीय जाँचों तक व्यापक पहुँच सुनश्चित करने की आवश्यकता की अनदेखी करता है. दवा की अबाध आपूर्ति की निश्चितता और भंडारण प्रणाली, और साथ ही, यूज़र फीस का उन्मूलन और दवा की आपूर्ति के लिए पर्याप्त धन आवंटन सहित कई मुद्दे हैं जो स्वास्थ्य परिचर्या की व्यापकता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. कई अफ्रीकी देशों आम जन तक स्वास्थ्य परिचर्या की व्यापकता को सुनिश्चित करने के लिए यूज़र फीस को अब वापस ले रहे हैं.

सार्वजनिक क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधाओं में भारी सुधार के बिना, लोगों—ख़ास करके ग़रीब लोगों—का रुझान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता. निजी क्षेत्र का बढ़ता हुआ उपयोग विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी है. देश के नीतिकार निजी क्षेत्र के उच्च प्रयोग को, निजीकरण को बढ़ाने और निजी क्षेत्र को अधिक राज्य सब्सिडी देने के लिए तर्क के रूप में प्रयोग करते हैं. जहाँ तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की बात है, यह दरअसल, चिकित्सा देखभाल के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को दी गयी सब्सिडी का ही एक रूप है, जो समाज के उन तबक़ों के बीच “प्रभावी मांग” पैदा करती है जिनकी निजी चिकित्सा परिचर्या तक पहुँच बहुत ही कम है. सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि आर॰एस॰बी॰वाई॰ के लिए सूचीबद्ध अस्पतालों में निजी क्षेत्र मुख्य रूप से है.

ऐसा प्रतीत होता है कि, बीमा आधारित मॉडल चिकित्सा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का हथकंडा है. दिलचस्प बात यह है कि बीमा आधारित मॉडल, एक ऐसा मॉडल है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में भी पूर्णरूपेणु काम नहीं करता है (राष्ट्रपति ओबामा ने टिप्पणी की है कि उनके देश को बीमा कंपनियों ने बंधक बना रखा है) और इसी मॉडल को अपनाने के लिए भारत जैसे देश—जहाँ ग़रीबी अत्यंत उच्च स्तर पर है, जनसंख्या का एक बड़ा अनुपात अनौपचारिक क्षेत्र में है—को सुझाव दिया जा रहा है. यह मॉडल प्रौद्योगिकियों के अत्यधिक और अनावश्यक उपयोग, नैतिक जोखिम की समस्याओं और उच्च लागत को बढ़ाता है.

सार्वजनिक सुविधाओं के प्रावधानीकरण के बीच, सामाजिक समानता का गंभीर मुद्दा भी क़ाबिले ग़ौर है. गोकि, इस मुद्दे को मज़बूती देने के लिए कोई आंकड़े नहीं हैं—वास्तव में इस डेटा की अत्यंत आवश्यकता है—निजी मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों एवं नर्सिंग होम आदि निजी-संस्थानों पर, बड़े पैमाने, पर उच्च जाति/वर्ग के लोगों का प्रभुत्व रहा हैं. इस प्रकार इन संस्थानों तक आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़ों, ग़रीबों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों और मुसलमानों, की न केवल रसाई कम है बल्कि ये संस्थाएं इन्हें सोशली एक्सक्ल्यूड भी कर रही हैं. इसलिए, ज़रूरत एक ऐसे सार्वजनिक स्वास्थ्य परिचर्या प्रणाली की है जो सभी सेवाएँ—प्राथमिक से लेकर तृतीयक; निवारक से लेकर उपचारात्मक चिकित्सा सेवाओं की गुणवत्ता सहित प्रावधानीकरण को दृढ़ बना सके. हम को महामारी विज्ञान के आँकड़े, निगरानी प्रणाली और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं आदि की भी अत्यंत ज़रूरत है. मुझे नहीं लगता कि, बारहवीं पंचवर्षीय योजना के इस मसौदे में, इन मुद्दों को उजागर करने के अवसर को गँवा दिया जाया जाए.

Wednesday, November 14, 2012

मुस्लिम अभ्यर्थियों के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट


वामपंथियों का कांग्रेसी पैंतरा

जेएनयू कैंपस में इन दिनों मुस्लिम अभ्यर्थियों को प्रवेश परीक्षाओं में 5 डेप्रीवेशन पॉइंट देने के लिए वामपंथियों के सभी संस्करण — अल्ट्रा-माओइस्ट  से लेकर संशोधनवादी-नवअवतरित वामपंथी छात्रसंगठन — कमरबंद हैं।  मज़ेदार बात तो यह है कि, इस क़िस्म के प्रोपोज़ल को लाने में सबसे पहले वह संगठन संगठन पेश-पेश था जिसका मानना था [है] कि स्कूल विशेष के ख़ास सम्प्रदायों के छात्रों को कहीं भी हांक कर लाया जा सकता है। सितम ज़रीफ़ी तो देखिये कि अब कैंपस के सारे संगठन इस मफ़रूज़े को अमल में लाने के लिए इस क़दर उत्साहित हैं कि वे इस बात को भूल गए हैं कि जेएनयू भारतीय संविधान परे नहीं है! अब सवाल यह है कि क्या वाक़ई में सारे संगठन इस हक़ीक़त से नावाक़िफ़ हैं या फिर मुसलमानों को बहलाने का कांग्रेसी नुस्ख़ा अपना रहे हैं?? इतना तो तय है कि, हमारे कॉमरेड इतने अज्ञानी नहीं हैं कि उनको इस बात की जानकारी न हो धर्म के आधार पर किसी क़िस्म का पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन न तो संवैधानिक और क़ानूनी तौर मुमकिन है और न ही सामाजिक न्याय के पैमाने पर उचित। तो फिर ये सारे हरबे सिर्फ़ कांग्रेसी पैंतरेबाज़ी नहीं तो और क्या है??

सभी के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट — समता और सामाजिक न्याय के पैमाने पर अनुचित तथा संवैधानिक रूप से अव्यावहारिक है

सामाजिक न्याय की तमामतर अवधारणाओं में, प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक जॉन राल्स की अवधारणा, शायद, सबसे प्रभावशाली है और इसको ख़ास अहमियत मिली है; अमर्त्य सेन भी अपने सामाजिक न्याय के नज़रिए में  जॉन राल्स से काफी हद तक इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। राल्स के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा वंचित व्यक्ति/समूह को सबसे अधिक लाभ मिलना चाहिए (जिससे कि, ख़राब स्थिति वालों को बेहतर स्थिति वालों के बराबर किया जा सके, मतलब यह कि, किसी भी प्रकार के लाभ के वितरण में ख़राब स्थिति वालों को ज़्यादा देना।) इतना तो साफ़ है  — और सामाजिक सच्चाई भी — कि मुस्लिम समाज हाईरेरिकल और जातिगत रूप से उतना ही असमान है जितना कि हिन्दू समाज। मुस्लिम को एक मोनोलिथ सोसाइटी समझना एक समाजशास्त्रिय ग़लती है। इसलिए सामाजिक न्याय व समता की दृष्टि से यह ज़रूरी है कि जो जितना ही ज़्यादा वंचित हो — उसे किसी क़िस्म के पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन का — उतना ही अधिक लाभ मिलना चाहिए।

मौजूदा संविधान के मुताबिक़ धर्म के आधार पर कोई भी पॉज़िटिव डिस्क्रिमिनेशन (आरक्षण) नहीं दिया जा सकता। आरक्षण का आधार केवल सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। तो धर्म के आधार पर किसी क़िस्म  आरक्षण असंविधानिक होगा, इसी आधार पर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट सहित उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यकों के साढ़े चार प्रतिशत के आरक्षण को ख़ारिज कर दिया था। अदालत का कहना था कि यह सब-कोटा देने का फैसला धार्मिक वजहों से लिया गया था। इसके पीछे और कोई आधार नहीं था। साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा की धर्म के आधार पर आरक्षण संविधान के ख़िलाफ़ है। तो फिर मुस्लिमों के लिए 5 डेप्रीवेशन पॉइंट की मांग करना मात्र छलावा नहीं तो क्या है? उसूलन तो होना यह चाहिए कि, कैंपस की सारी छात्र बिरादरी, ख़ासकर प्रोग्रेसिव फ़्रेटरनिटी को पिछड़े/पसमांदा मुसलमानों को उनके हक़ और इंसाफ़ दिलाने के लिए आगे आना चाहिए और इसके लिए ऐसी हिकमत-ए-अमली अख़तियार करनी चाहिए कि 5 डेप्रीवेशन पॉइंट का मुद्दा वाक़ई में क्लिंच हो जाए नाकि सिर्फ़ थोथरी बातें व बेकार की लफ्फ़ाज़ी..

Tuesday, November 15, 2011

यौमे इत्फ़ाल

दो दिन क़ब्ल, मुल्क में तमाम मानाये जाने वालों यौमयौमे आज़ादी, यौमे जम्हूरियत, यौमे ख़वातीन, यौमे बुज़ुर्गानकी शृंखला में यौमे इत्फ़ाल मनाया गया. मगर हक़ीक़त यह है कि यह 'यौम' भी तमाम दूसरे यौम के मानिंद सिर्फ़ एक रस्म अदायिगी भर था. दरहक़ीक़त, इत्फ़ाल का ताल्लुक़ मुल्क की तरक़्क़ी से है क्योँ कि यही इत्फ़ाल आगे चल कर मुल्क का एक अहम वसायल-इंसानी वसायल बनते हैं. नोबल प्राईज़ याफ़्ता माहिरे इक़्तसादियात गैरी बेकर की तमामतर तस्नीफ़ात इस बात की ताईद करती हैं कि कैसे इंसानी वसायल (बज़रिये तालीम--तरबियत) मुल्क--क़ौम की तरक़्क़ी के लिए निहायत ही ज़रूरी हैं. मगर साल-दर-साल ख़राब रिकार्ड के बावजूद यह शओबा अदम तवज्जही का शिकार है. सरकार सिर्फ़ आरटीई पास कर के अपना पल्ला झाड़ लेती है, जो की एक अलग बहस का मुद्दा है. हमारा मुल्क दुनिया के सबसे ज़्यादा पांच साल से कम उम्र के बच्चों की शरह--अमवात वाले मुल्कों में से एक है. हर बीस सेकंड में पांच बरस से कम उम्र का एक बच्चा हमारी सरज़मीन पर फ़ौत हो जाता है. और इस मुल्क के हुक्मरान ऐसे हैं कि ख़्वाब--ग़फ़लत से बेदार होने को तैयार नहीं है. अभी चंद रोज़ पहले मग़रबी बंगाल के अस्पतालों में मासूम बच्चों की हलाकत का सानेहा गुज़रा है. और यह मसला सिर्फ़ मग़रबी बंगाल का ही नहीं, बल्कि पूरे मुल्क का है. अगर मुल्क में मौजूद हेल्थ सिस्टम की ज़ुबुंहाली का तजज़िया किया जाए तो एक अजीब अफ़सोसनाक हक़ीक़त की दर्याफ़्त होती है. पब्लिक हेल्थ सिस्टम दोनोंतिब्बी और बह-तिब्बी अहलकारों की कामी से जूझ रहे हैं. अठ्ठारह फ़ीसद अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, अड़तीस फ़ीसदी अस्पताल बिना किसी लैबोरेटरी टेक्नीशियन के काम कर रहे हैं और सोलह फ़ीसदी अस्पतालों में फार्मेसिस्ट तक नहीं हैं. स्पेशलिस्ट डाक्टरों की तो और भी कमी है, तकरीबन पचास फ़ीसद से भी ज़्यादा अस्पतालों में स्पेशलिस्ट डाक्टर नहीं हैं. और जहाँ तक सेहत--आम्मा में सरकारी ख़र्च का मसला है तो उसमे भी हमारा मुल्क सबसे पीछे है, 2004-05 के आंकड़े बताते हैं की सेहत पर जीडीपी का एक फ़ीसदी से भी कम (0.97%) ख़र्च होता है. आलमी इदारा--सेहत (डब्ल्यू एच ) का कहना है कि हिन्दुस्तानी शहरियों में 70 फ़ीसद ऐसे हैं जो अपनी पूरी आमदनी दवा और इलाज--मुआल्जा पर सर्फ़ करने को मजबूर हैं. ज़ाहिर है इन में अक्सरियत उन लोगों कि है जो बेचारे बेहद ग़रीब हैं. अगर हुकूमत एहसान फ़रामोशी करे और बिलख़ुसूस जिन लोगों के बल बूते पर एक़तदार हासिल करती है करती है उनकी दादरसी की सिर्फ़ ये फ़िक्र कर लिया करे कि उन्हें पीने का साफ़ पानी, खाने-पीने के लिए मुतावाज़िन ग़िज़ा और रहने को साफ़ सुथरे माहौल में एक मकान की ज़मानत दे दे तो उन बीमारियों के लाहिक़ होने का ख़तरा ही टल जाएगा जो ग़ुरबतज़दह अवाम को भयानक ख़्वाब की तरह डराती रहती है. मगर रोना तो इसी बात का है. हुसूले आज़ादी के तिरसठ साल बाद भी हमारे मुल्क के बहुतेरे ईलाक़ों में पीने का साफ़ पानी है बिजली, सड़कें हैं अस्पताल, अलबत्ता मफ़ादपरस्ती और ज़रपरस्ती हर जगह है.

बच्चों की नाक़िस गिज़ाईयत को कम करना मुल्क के लिए एक बड़ा चैलेन्ज बन गया है. हिन्दुस्तान एक ऐसा वाहिद मुल्क है जहाँ के बच्चों में नाक़िस गिज़ाईयत का बार सबसे ज़्यादा है; और तो और, सब-सहारा मुल्कों से भी ज़्यादा है. तक़रीबन साठ मिलियन बच्चे कम वज़न हैं; पचास फ़ीसद से भी ज़्यादा एनीमिया का शिकार हैं; और भी पचास फ़ीसद से भी ज़ायद बच्चे किसी भी तरह की हिफाज़तकारी से इस्तसना हैं. इंटरनेश्नल फ़ूड पॉलिसी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) की हालिया जारी करदा रिपोर्ट 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI) 2011' के मुताबिक़ 112 मुल्कों में हमारी पोज़िशन 67वीं है. हमारी पोज़िशन अपने जनूबी एशियाई पड़ोसियों-पाकिस्तान, श्रीलंका और चीन और सब-सहारा मुल्कों- रवांडा, लाईबेरिया, जबूती, मोज़ाम्बीक और सूडान से नीचे है. और जहाँ तक, नाक़िस गिज़ाईयत का मसला है तो माहीरेने गिज़ा बरुन और रूएल अपने मुताले में इस नतीजे तक पहुंचे के हिन्दुस्तान की पोज़ीशन, बच्चों की नाक़िस गिज़ाईयत के एतबार से 2006 में 119 मुल्कों में से 117 वीं थी मतलब कि नीचे से तीसरी पोज़ीशन.

बच्चों की हलाकत, ताग्ज़ियाह का मसला और बच्चा मज़दूरी ऐसे बुनयादी मसायेल हैं जिन से नित नए मसायेल पैदा होते रहते हैं और हुकूमत चंद एक मसायेल को भी हल नहीं कर पाती. बच्चों की तरफ़ से इस की लापरवाही का यह हाल है कि रज़ाकार तंज़ीमें मौक़ा--मौक़ा आवाज़ उठाएं तो इलाज मुआलिजा के नाम पर ग़रीबों को वह भी मिले जो कभी कभार भीख के टुकड़ों की तरह मिल जाता है. भूक ग़ुरबत के बारे में सोचिये तो अफ्रीक़ी मुल्कों का तसव्वुर उभरता है लेकिन ग़ौर कीजिए हम तो उनसे भी गए गुज़रे हैं!

Monday, October 17, 2011

भूख-ओ-इफ़्लास का सामराज

अभी ख़त--इफ़्लास (पावर्टी लाईन) के सतह की अज़-सरे-नौ तारीफ़ करने पर मंसूबाबंदी कमीशन (प्लानिंग कमीशन) और सरकार की लै-दै और किरकिरी हो ही रही थी कि इंटरनेश्नल फ़ूड पॉलिसी एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (इफ़्प्री) की हालिया जारी करदा रिपोर्ट 'ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) 2011', नाक़ाबू अफ़्लास--भूख फैलाव पर, एक बार फिर, सरकार की नाकरदगी और नाकामयाबी को उजागर करती है.

हालिया जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इंडिया 23.7 के जीएचआई स्कोर के साथ ओवरआल रैंकिंग में अपने जनूबी एशियाई पड़ोसियों-पाकिस्तान, श्रीलंका और चीन से नीचे है. मुल्क की ख़ुराकी ज़मानत की सूरतेहाल को देखते ही इफ़्प्री ने इसे (23.7 के स्कोर को) "अलार्मिंग" (ख़तरनाक) के ज़ुमुरे में रखा है. दुनिया के बदतरीन ख़ुराकी ज़मानत वाले 81 मुमालिक में इसकी 67 वीं पोज़िशन है. इसका मतलब यह है कि सिर्फ़ दुनिया में14 ही मुल्क ऐसे हैं जिनके लोगों की गिज़ाई हैसियत (न्यूट्रीशनल लेविल) हम से बदतर है.

भूख की पैमाईश के लिए माहीरीन--इक़तसादियात (एकोनोमिस्ट्स) मुख्तलिफ़ इंडिकेटर का इस्तेमाल करते हैं. और चूँकि भूख को मुख्तलिफ़ नुक़त--नज़र और ज़ावियों से देखा जा सकता है चुनांचे इफ़्प्री ने भूख की कसीर-उल-इबाद फ़ितरत को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे इंडेक्स की तश्कील की जो भूख के ज़्यादा से ज़्यादा डाईमेंशंस की अक़क़ासी कर सके. इसके लिए इसने जीएचआई (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) का तस्ववुर पेश किया. यह इंडेक्स तीन इंडिकेटरकम गिज़ाईयत (अंडरनरिश्मेंट; बच्चों का कमवज़न; और बच्चों के मौत की शरहको बराबर वज़न देते हुए यकजा करता है.

पहला इंडिकेटर, अंडरनरिश्मेंट का है जो जो नाकाफ़ी कैलोरी पर इक्तिफ़ा कर रहे लोगों की सतह बताता है इसकी पैमाइश गिज़ा की कमी से दो-चार हो रहे लोगों का पूरी आबादी में फ़ीसदी तनासुब (परसेंटेज) निकाल कर की जाती है. इससे मुताल्लिक़ डेटा और दीगर जानकारी इदारा बराए ख़ुराक--ज़रा'अत (एफ़एओ) मुहय्या करता है.
दूसरा इंडिकेटर, बच्चों को मिलने वाली कम और नाकाफ़ी गिज़ाईयत की अक्क़ासी करता है. और इसकी पैमाइश, पांच साल से कम, कम-वज़न (बशमूल वेस्टिंगउम्र के लिहाज़ से कम वज़न, स्टटिंगउम्र के लिहाज़ से कम लम्बाई या दोनों) बच्चों का तनासुब निकाल कर की जाती है. और इसका डाटा बेस आलमी इदारा--सेहत (डब्ल्यूएचओ), इक़वाम--मोत्ताहेदा का फंड बराए अत्फ़ाल (यूनीसेफ) और मुख्तलिफ़ सेहत--शुमारियत आबादी के सर्वे पर मुश्तमिल है.
और तीसरा इंडिकेटर, नाकाफ़ी गिज़ा और नासालिम माहौल की मोहलिक हमकारी की अक्क़ासी करता है. और इसकी पैमाइश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों का शरह--अमवात (U-5 मोर्टेलिटी रेट) का इस्तेमात करते हैं. इससे वाबस्ता तमाम जानकारियां डेटा भी यूनीसेफ मुहय्या कराता है.

भूख की यह कसीर-उल-इबाद (मल्टीडाइमेन्शनल) वज़ाहत, कई मामलों में, कई फ़ाइदे फ़राहम करता है. मसलन, यह सिर्फ़ पूरी आबादी को ध्यान में रखता है बल्कि जिस्मानी तौर से आसेब पज़ीर जमातबच्चों, जिनको गिज़ा की कमी की वजह से ज़्यादा बीमारी का ख़तरा, ख़राब जिस्मानी--दिमाग़ी तरक्क़ी और मौत का ख़तरा लाहिक़ होता हैको भी ध्यान में रखता है. इसके अलावा यह इन आज़ाद इक्दामात इंडिकेटर को मिलाकर पैमाशी ग़लती के असरात को भी कम कर देता है. जीएचआई मुल्कों को 100 पॉइंट के पैमाने पर रैंक करता है. सिफ़र (0) सबसे अच्छा स्कोर है जिसका मतलब है भूख कि ग़ैर-मौजूदगी, और सौ (100) सबसे ख़राब स्कोर है जिसका मतलब है सिर्फ़ भूख ही भूख का सामराज. हालांकि, हक़ीक़ी अम्ल में ये दोनों इन्तहा नहीं पाए जाते.

इफ़्प्री मुल्कों को, उनके जीएचआई स्कोर के मुताबिक़ पांच ज़ुमुरों में तक़सीम करता है. पहले ज़ुमुरे में वो मुमालिक आते हैं जिनका जीएचआई स्कोर 4.9 से कम ("लो") है. इसको कम सतह के स्कोर से मंसूब करते हैं. मतलब यह कि, इस ज़ुमुरे में आने वाले मुल्कों में भूख का फैलाव कम है और इनकी गिज़ाई ज़मानत काफ़ी अच्छी है. दूसरे ज़ुमुरे में आने वाले मुल्कों का जीएचआई स्कोर 5 से 9.9 के बीच है. जीएचआई की यह सतह, इफ़्प्री के मुताबिक़, मो'तदिल ("मोडरेट") है. इसका मतलब ये हुआ कि, इस ज़ुमुरे में आने वाले वो मुमालिक हैं जहाँ भूख का तसल्लुत अभी कुछ कम है. मिसाल के तौर पर, मारीशस, चीन, त्रिनिदाद और टोबैगो और किरगिज़तान वग़ैरह. तीसरा ज़ुमुरा, इफ़्प्री के लफ़्ज़ों में, संगीन ("सीरियस") है. इसमे आने वाले वो मुमालिक हैं जिनका जीएचआई स्कोर 10 से 19.9 के बीच है. ये वो मुल्क हैं जहाँ भूख का तसल्लुत अब एक संगीन मोड़ ले चुका है. मसलन, विएतनाम, बोलिविया, बोत्स्वाना, युगांडा और केन्या वग़ैरह. चौथा दायरा उन मुल्कों का है जिनके जीएचआई स्कोर 20 से 29.9 के बीच हैं. इस ज़ुमुरे को इफ़्प्री, ख़तरनाक ("अलार्मिंग") नाम देता है. ये वो मुमालिक हैं जहाँ भूख एक मोहलिक परेशानी बन गयी है और गिज़ाई ज़मानत निहायत ही बदतर हालत में है. इंडिया, चाड, हैती, बुरुंडी, और अंगोला जैसे मुमालिक इस ज़ुमरे में जगह पाते हैं. और, आख़िरी, पांचवा ज़ुमुरा उन मुल्कों की नुमाइंदगी करता है जिनके जीएचआई स्कोर 30 से ज़्यादा हैं. इस ज़ुमुरे की, बहुत ही ख़तरनाक ("इक्सट्रीमली अलार्मिंग") के नाम से दर्जाबंदी की गयी है. ये वो मुमालिक हैं जहां भूख के हालात बहुत ही ख़तरनाक हैं या यूँ कहें की भूख का फैलाव क़ाबू से बाहर हो गया है. इस ज़ुमुरे में आनेवाला सिर्फ़ एक ही मुल्क है जोकि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉम्बो है.

इस साल यानि के 2011 में इंडिया का जीएचआई स्कोर 24.7 है जब कि ठीक दस बरस क़ब्ल यह स्कोर 24.1 था, मतलब साफ़ है कि इन दस सालों में भूख का फैलाव कम होने के बजाय, एक हद तक वसीअ'तर होता गया है. दूसरी तरफ़ सरकारी दावे कुछ और ही राग अलाप रहे हैं. इनके दावों के मुताबिक़ मुल्क ने भूख के मसअले को हल करने में क़ाबिल--तवज्जेह तरक्क़ी की है. एनएसएसओ के डेटा इस बात को दिखा रहे हैं कि अहलेख़ाना के भूख की सतह में काफ़ी कमी आई है, जो 1983 में 17.3 से घट कर 2004-05 में 2.5 के सतह पर पहुँच गया. जबकि हक़ीक़त कुछ और ही है. इफ़्प्री और सरकारी तख्मीने में तनाक़िज़--गड़बड़ी की दो वजूहातें हैं. पहली यह कि, एनएसएसओ से भूख की जो शरह निकाली जा रही है वह अहलेख़ाना (हाउस-होल्ड) के सतह पर है जबकि इफ़्प्री अपने जीएचआई में भूख की शरह को इन्फ़रादी (इन्डिवीजुअल) सतह पर कैल्क्यूलेट करता है. दूसरी यह कि, एनएसएसओ भूख से मुतअल्लिक जो डेटा इकठ्ठा करता है वो ख़ुद-ख़याल (सेल्फ-परसेप्शन) की बिना पर होता है. और जो भी कोई दिन भर में सिर्फ़ दो वक़्त खाना पा रहा हैबिना गिज़ाई अहमियत की परवाह कियेवह भूख के शिकंजे से बाहर समझा जाएगा. और वह लोग जिनको कभी मुतानासिब गिज़ा ही मिली हो वह अपनी गिज़ा और भूख का अंदाज़ा कैसे लगा सकते हैं! साइंटिफिक तौर पर वह भूख का शिकार होते हुए भी वे लोग इसको पहचान नहीं पाते, या अमर्त्य सेन के लफ़्ज़ों में "परसेप्शन बाएस" का शिकार होते हैं. इसलिए एनएसएसओ के ज़रिये भूख की जो शरह मिलती है वह दस्तेकम गिरफ़्त (अंडर-एस्टिमेटेड) होती है.

यूँ तो, इफ़्प्री, भूख के फैलाव और ख़ुराक की कमी और गिज़ाई अदम तहफ्फुज़ की वजह बढ़ती हुई (और भरी उतार चढ़ाव वाली भी) क़ीमतों में तलाश करता है. गोकि, इसमें कोई शक नहीं कि गिज़ाई क़ीमतों की यह वोलैटीलिटी खुराक के हुसूल में रुकावट है; ताहम, यह बात भी वाज़ह है कि आबादी की हक़ीकी ख़ुराकी ज़मानत के लिए एक वसी' इक्दामात की ज़रुरत पड़ती है. ये सारे या इनमे से बेशतर इक्दामात अवामी मुदाखिलत से मुंसलिक होते हैं. खुराक की मुनासिब मिक़दार में फ़राहमी के लिए ज़राई पैदावारी में इज़ाफ़े की ज़रुरत होती है, फ़सल के पैटर्न में मुम्किनाह तब्दीली, और यक़ीनी तौर से खेती की मुसलसल नातीजाखेज़ी, और ये सब मक़ामी और क़ौमी दोनों सतहों पर ज़रूरी है. साथ ही, खुराक पर सभी लोगों की रसाई को यक़ीनी बनाने लिए ज़रूरी है कि लोगों के पास क़ूवत--ख़रीददारी हो, इसका मतलब है रोज़गार, उजरत और ज़रिया मआश के मसले अहम हैं. यह बात भी क़ाबिले ग़ौर है कि समाजी इम्तियाज़ात और इख़राज का भी ख़ुराक की रसाई और ज़रिया मआश दोनों का तअय्युन करने में काफ़ी अहम किरदार है. चुनांचे ज़रुरत इस बात की भी है कि समाजी सेट-अप को भी ध्यान में रखा जाए. और जहाँ तक नाक़िस गिज़ाईयत (मॉलनरिश्मेंट) का मसअला है, तो इसका गिज़ाई नकमयाबी के साथ साथ ख़राब सफाई के इंतज़ामात, और दीगर नासालिम अमलियात से काफ़ी गहरा इर्ताबात है; इसीलिए साफ़ पीने के पानी की फ़राहमी, सफाई और दूसरी बुनियादी सहूलात तक रसाई के साथ ही साथ सही और मतलूबा खाने के आदात--अतवार के बारे इल्म भी ज़रूरी है. और ये सब इक्दामात, एक हद तक, सरकारी और अवामी मुदाखिलत के बिना मुमकिन नहीं है. तो ज़रुरत इस बात की है कि सरकार एक मज़बूत क़ूवत--इरादी और ज़िम्मेदाराना रवैये से खूर्द और सेहत-ए आम्मा की तक आम लोगों तक रसाई को यक़ीनी बनाए क़ब्ल इसके कि हालत और बेक़ाबू होजाएँ.