Friday, April 17, 2015

अप्रभावी कृषि मूल्य नीति



मशहूर शायर बेकल उत्साही की पंक्तियाँ हैं—सुनिए जनाब मेरा ही हिंदुस्तान है नाम/ खेती मेरा वसूल है फ़ाक़ा स्वभाव है।यह फ़ाक़े की मार और भी घातक हो जाती जब एक ओर किसान को फ़सल या कृषि-उत्पाद का उचित मूल्य न मिले। और दूसरी ओर मौसम की घातक मार से उत्पादन भी कम हो जाय।
केंद्रीय सांख्‍यिकी कार्यालय (सीएसओ) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार उपभोक्‍ता खाद्य मूल्‍य सूचकांक (सीएफपीआई) पर आधारित महंगाई दर 6.14 फ़ीसदी रही है। वहीं थोक मूल्य मुद्रास्फीति (डबल्यूपीआई) ऋणात्मक रही है जो कि -2.33 प्रतिशत है। डबल्यूपीआई पिछले 9 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है।

यह अजीब स्थिति है कि एक तरफ़ तो कृषि जिंसो/उपज की थोक मुद्रा स्फीति कम हो रही वहीं उपभोक्ता खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ रही है। मतलब यह कि एक तरफ़ तो खेती-किसानी अत्यंत अलाभकारी हो रही है, किसानों की कमर टूट रही है। दूसरी ओर, बढ़ती क़ीमतें आम उपभोक्ताओं की जेब कतर रही हैं। लेकिन, फिर भी ज़्यादा मार तो बेचारे उन करोड़ों सीमांत जोत वाले किसानो पर पड़ती है जो सिर्फ़ कृषि पर ही निर्भर रहते हैं, नक़दी फ़सलों व खाद्यान्न की कम व अलाभकारी क़ीमतें उनको कहीं का नहीं छोड़तीं।

उपभोक्‍ता खाद्य मुद्रास्फीति की उच्च दर और फल और सब्ज़ी मुद्रास्फीति उच्चतम दर चिंता का विषय है। अब सवाल उठता है कि यह कृषि मूल्य नीति की विफलता है या राजनीतिक विफलता? वास्तव में, यह दोनों विफलताएँ हैं — मूल्य नीति तो विफल हुई ही है; साथ में यह राजनीतिक विफलता भी है। वह भी ऐसे समय में जब बड़े ही नियोजित तरीके से किसानों से उनकी ज़मीन कॉर्पोरेट को सौंपी जा रही हो। कृषि मूल्य नीति की विफलता एक राजनीतिक विफलता तो है ही साथ में संस्थागत विफलता है। किसी भी संस्था की सफलता या विफलता इसको नियंत्रित करने वालों की राजनीतिक इच्छाशक्ति व वैचारिक प्रतिबद्धधता पर निर्भर करती है। सरकार फल और सब्जियों सहित आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण नहीं रखना चाहती। क़ीमत स्थिरीकरण तंत्र को लगभग नाकाम कर दिया गया है। स्पष्ट है कि इससे खेतिहर मज़दूरों-किसानों और आम उपभकताओं की स्थिति बदतर होगी मगर वहीं पूंजीपतियों की तिजोरियाँ भरेंगी। निजी पूंजी के प्रति अत्यंत आग्रही सरकार और पूंजीपतियों को आख़िर यही तो चाहिए!

ध्यान देने योग्य बात यह कि काफ़ी लंबी अवधि से क़ीमतें निरंतर ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसको उंचा रखने में उत्पादक-संघ (कार्टेल), राजनेताओं, सट्टेबाजों और व्यापारियों का हाथ है। यह एक तरह से कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) की कमज़ोरी व विफलता है। यह स्थिति तब तक सुधारने वाली जब तक इस संस्थागत कमी को दूर नहीं किया जाएगा और एपीएमसी व अन्य प्रणालियों को सुधारा नहीं जाएगा।

सरकार हर वर्ष कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसाओं
, संबंधित राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के विचारों तथा अन्य महत्वपूर्ण कारकों के आधार पर 20 से ज़्यादा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित करती है। लेकिन सितम ज़रीफ़ी यह है कि सीएसीपी और एमएसपी की इस प्रणाली के दायरे में सिर्फ़ चावल और गेहूं की ही फसलें आ पायी हैं।

1965
में स्थापित कृषि मूल्य आयोग की स्थापना न केवल कृषि उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए बल्कि किसानों को लाभकारी मूल्य प्रदान करने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग के लिए भी किया गया था, इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), अधिप्रप्ति मूल्य (प्रॉक्यूरमेंट प्राइस) व अन्य मूल्य उपकरणों का सहार लिया गया। लेकिन कालांतर में सीएसीपी और एमएसपी का हस्तक्षेप केवल चावल और गेहूं के सरकारी ख़रीद तक सीमित हो कर रह गया। यह हस्तक्षेप भी इन दिनों दम तोड़ता नज़र आता है। अंततः एमएसपी अब अधिप्रप्ति मूल्य तक ही सीमित होगया है — सरकार अब सिर्फ़ गेहूं और धान की ही ख़रीद करती है। इस मामले में अन्य फसलें विशेष रूप से दलहन, तिलहन और कई और नक़दी फसलें उपेक्षा की शिकार हैं।

कृषि के लिए प्रभावी मूल्य नीति की विफलता महज़ उन सारी संस्थाओं की विफलता है नहीं है जिनके ज़िम्मे मूल्य-स्थिरता को बनाए रखने का कार्य है
, बल्कि यह सरकार की नीतियों की भी विफलता है जो कृषि उत्पादन के बदलते स्वरूप के साथ क़दम न मिलाने में अक्षम साबित हुई।
भारतीय कृषि को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार व व्यापार के साथ सम्बद्ध करने से कृषि जिंसों पर न सिर्फ़ घरेलू मांग, आपूर्ति और विपणन बाधाओं का दबाव रहता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय क़ीमत में उतार चढ़ाव का भी असर पड़ता है।

एक साल पहले चुनाव अभियानों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह
स्वामीनाथन फॉर्मूले के आधार पर कृषि उपज को लाभकारी मूल्य प्रदान करेगी। किसानों को उनकी लागत में 50 फ़ीसदी मुनाफ़ा जोड़कर फ़सलों का दाम दिलाया जाएगा। लेकिन सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार न सिर्फ़ अपने वादे से पलट गयी बल्कि खाद्यान्नों की ख़रीद को भी कम कर दिया है।

ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में गिरावट से देश के बहुसंख्य किसानों की आजीविका पर बन आई हो। किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हों। तो ज़रूरत इस बात की है कि ऐसे सांस्थानिक प्रयास किए जाएँ व ऐसा प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए जो किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाये जाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी उचित मूल्य पर खाद्यान्न भी उपलब्ध कराए। इसके लिए एक बृहत राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

Monday, March 2, 2015

मासूम धोखा


वित्तमंत्री अरुण जेटली का बजट भाषण सुनते हुए मुझे अनायास ही प्रसिद्ध अर्थशास्त्री-राजनयिक जॉन केनेथ गालब्रेथ और उनकी पुस्तक द अफ़फ़्लुएंट सोसाइटी का स्मरण हो आया। इस पुस्तक में उन्होने ने सामाजिक संतुलन का तसव्वुर पेश किया। सामाजिक संतुलन का मतलब है निजी और सार्वजनिक व्यय के बीच स्वीकार्य संबंध। शिक्षा, जनस्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, सामाजिक सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में इतना सार्वजनिक व्यय होना चाहिए कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आम आदमी की जेबें न ढीली हों, उनका ख़ुद का बजट न गड़बड़ाए।
उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार का यह बजट तीन मामलों में दिलचस्प है। पहला, लगभग तीस साल बाद यह एक ऐसी सरकार द्वारा पेश किया जा रहा है जो पूर्णतः बहुमत में है। इसलिए सरकार को अपनी नीति और आकांक्षाओं के अनुरूप बजट बनाने की पूरी स्वतन्त्रता है। दूसरे, चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी आ चुकी है, और इसके सुझाव 1 अप्रैल 2015 से लागू होंगे और 31 मार्च 2020 तक लागू रहेंगे। तीसरा, सरकार ने योजना आयोग भंग करके नीति आयोग नामक दूसरा संस्थान बनाया है, जो दिशात्मक और नीति निर्धारक थिंक टैंक है। हो सकता है इन तीनों परिघटनाओं ने भी  सरकार के बजट निर्माण की परिक्रिया को प्रभावित किया हो।
प्रधान मंत्री मोदी ने लाल क़िले की प्रचीर से कहा था कि देश तीन डी’—डेमॉक्रेसी (लोकतन्त्र), डेमॉग्राफी (जनांकीय) और डिमांड (मांग)—से समृद्धित है। वास्तव में ये तीन डीतभी कारगर होंगे जब देश में स्वास्थ्य और शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पुख्ता इंतज़ाम हो और इन तक देशवासियों की सहर्ष पहुँच हों। मानवीय व लोकतांत्रिक चेतना पैदा करने के लिया शिक्षा की आवश्यकता है। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य से बेहतर मानव पूंजी का निर्माण होता है, और यही कुशल मानव पूंजी जनांकीय भाज्य है। ज़ाहिर है जब यह मानव पूंजी अर्थव्यवस्था में विनोयोजित होगी तो मांग उत्पन्न करेगी। कुल मिला कर सामाजिक क्षेत्रक मजबूत होना चाहिए।

दो दिन पहले मोदी सरकार का पहला पूर्ण बजट लोकसभा में पेश किया गया। चूंकि मोदी सबके विकासकी बात किया करते हैं तो ऐसी प्रत्याशा थी कि इस बजट में सामाजिक व लोक कल्याणकारी योजानाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। लेकिन आशा के विपरीत इन योजनाओं और कार्यक्रमों में काफी फ़ंडकट हुआ। मसलन, स्कूली शिक्षा की मदों में आवंटन पिछले वर्ष की अपेक्षा 23 प्रतिशत कम कर दिया गाया। ज़ाहिर है इससे कौशल निर्माण पर प्रभाव पड़ेगा। जबकि उच्च शिक्षा के आवंटन में 3 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी की गयी। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन इस बजटीय आवंटन में बच्चो से संबधित योजनाओं/कार्यक्रमों में 56 प्रतिशत से भी अधिक की कटौती कर दी  गयी। इस तथ्य को भी पूरो तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए कि भारत ग्रामों में बसता है, ग्रामीण विकाससे संबन्धित योजनाओं में 10 फीसदी का फंड-कट हुआ। मानव विकास के अहम पहलू, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की मद में भी 16 प्रतिशत की कटौती की गयी। देश में वक़्त-बेवक़्त जापानी इन्सेफ़्लाइटिस, स्वाइन फ़्लू, येलोफ़ीवर और इन जैसी अनेक बीमारियाँ पैर पसार देती है। इन रोगों से निपटने के लिए इनकी एपीडेमेओलॉजिकल स्टडी व अनुसंधान ज़रूरी है। इस बजट में स्वास्थ्य अनुसंधान में कोई बढ़ोतरी नहीं कि गयी। इतना ही नहीं एड्स नियंत्रण कार्यक्रमों में भी 22 प्रतिशत आवंटन कम किया गया।
गालब्रेथ ने अपनी एक अन्य पुस्तक—इकॉनोमिक्स ऑफ इनोसेंट फ्रॉड: ट्रुथ ऑफ अवर टाइम—में बताया है कि अमेरिकी समाज कैसे पूँजीवाद के लिए अब बाजार अर्थव्यवस्था शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। यथार्थ को छिपाने के लिए मनोहारी शब्द-जाल बुना जाता है। गालब्रेथ इसे निरीह कपट का सटीक उदाहरण मानते हैं। सबका साथ और सबका विकास भी ऐसा ही मासूम धोखा है। सच्चाई तो यह है कि एक तरफ तो सम्पत्ति कर (वेल्थ टेक्स) को हटाया गया तो दूसरी तरफ़ कॉर्पोरशंस का कॉर्पोरेट टैक्स 30 से घटा के 25 प्रतिशत किया। पूंजीपतियों के विकास की राहें हमवार कि जा रही हैं तो ग़रीब से लोगों से उनके रोजगार की गारंटी छीनी जा रही है जिससे निश्चय ही सामाजिक संतुलन बिगड़ेगा।

Tuesday, February 10, 2015

रंग पैरहन का

रंग पैरहन का, ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम, मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम। यह शेर है उर्दू के विश्वप्रसिद्ध शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का, जिनके बग़ैर उर्दू साहित्य और भाषा का इतिहास अधूरा है। फ़ैज़ ठीक 104 साल पहले, 13 फरवरी 1911 को स्यालकोट में पैदा हुए। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं हुई और उच्च शिक्षा के लिए गर्वनमेंट कॉलिज लाहौर आ गए, जहां से उन्होने ने बीए ऑनर्स अरबी भाषा और साहित्य और अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया। 1935  में फ़ैज़ ने एमएओ कॉलिज अमृतसर में अंग्रेज़ी साहित्य के प्राध्यापक की हैसियत से शमूलीयत इख़तियार की। 1942 में वे ब्रिटिश फ़ौज में कैप्टन हो गए और दूसरे विश्व-युद्ध में हिस्सा लिया। 15 अगस्त 1947 को अग्रेज़ों ने जाते जाते देश के दो टुकड़े कर दिये। वे पाकिस्तान में रहे और 1951 में उन पर रावलपिंडी साज़िश केस का मशहूर मुक़द्दमा भी हुआ और उन्हें क़ैद-ओ-बंद की दुश्वारियाँ भी बर्दाश्त करनी पड़ीं। क़ैद का यह ज़माना में उनकी शायरी में एक नया निखार लेकर आया। कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं। सद शुक्र कि अपनी रातों में, अब हिज्र की कोई रात नहीं। फ़ैज़ के ऐसे तमाम शेर जो उनके कारावास के दिनों की ही याद हैं जिन्हों ने उनको साहित्य की दुनिया का ताबिंदा सितारा बना दिया।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ वह एकमात्र पाकिस्तानी शायर हैं जिन को चार बार साहित्य के नोबल इनाम के लिए नामज़द किया गया। उन्हें 1962 में लेनिन पीस प्राइज़ भी नवाज़ा गया। फ़ैज़ की शायरी पर पंजाबी सूफ़ी रवायात और सोशलिज़्म की छाप भी नुमायां हैं। फ़ैज़ को उर्दू पोइट्री का नेरूदा भी कहा जाता है। पाब्लो नेरुदा की तरह फ़ैज़ ने शायरी को सामाजिक मुद्दों को विभिन्न एहसासात से जोड़ते हुए यादगार रुमानवी गीतों का हिस्सा बना दिया। फ़ैज़ अपनी शायरी में सिर्फ़ भौतिक मुद्दों पर ही तवज्जों नहीं देते बल्कि ठोस वास्तविक मामलों का ज़िक्र करते हुए मिलते हैं। नेरूदा के मामले में भी यह बात दुरुस्त है। दोनों ने हक़ीक़ी मसायल को मौज़ू बनाया। रोटी की बात की। शांति और सुरक्षा के लिए दोनों ने क़लम उठाया। लिबरल और सेक्युलर मूल्यों पर यक़ीन रखने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी प्रगतिशील सोच और शायरी से पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया की अब तक की तीन पीढ़ियों को प्रभावित कर चुके हैं। पाब्लो नेरूदा को भी तक़रीबन वैसे ही हालात का सामना करना पड़ा जैसे फ़ैज़ को दरपेश रहे। फ़ैज़ के शायरी की ख़ास बात यह कि उन्होने जो बिम्ब, उपमाएँ, शब्द, लय, मूसीक़ीयत और शायराना ख़ाके अपनाए वे पुराने पड़ते दिखाई नहीं देते — ये देश काल से परे हैं।
फ़ैज़ की शायरी अपनी फ़ितरत में सियासी रंग लिए हुए है — अच्छी शायरी की यही विशेषता होती है कि इसमें रोज़मर्रा ज़िन्दगी के मसाएल और मुहावरे मिलते हैं। मीर, ग़ालिब और हाफ़िज़ जैसे महान कवियों की शायरी की भी यही विशेषता रही है। उनकी शायरी ने ज़हनों को रोशन किया है। हमें दुनिया भर में मौजूद विभिन्न संस्कृतियों को समझना और उन का सम्मान करना सिखाया। फ़ैज़ की कविता में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है दबे-कुचलों के प्रति दुख-दर्द की भावना, जनमानस से अटूट रिश्ता। वे एक तरफ़ अफ़्रीक़ा के मामलों पर सहानुभूति प्रकट करते दिखाई देते हैं और साथ ही फ़लस्तीन के मसले की बाबत बात करते नज़र आते हैं। वे अफ्रीकी स्वतन्त्रता प्रेमियों के समर्थन में अफ्रीक़ा कम बैक का नारा लगाते हैं और साम्राज्यवादियों से संघर्षरत अरबों के समर्थन में सर-ए-वादी-सना और फिलिस्तीनी बाँकों को श्रद्धांजलि पेश करने के लिए दो नज़्में फिलिस्तीन के लिए लिखकर अपना क्षोभ प्रकट करते हैं। शायरी की सब से ख़ास बात ही ये है कि ये हमें दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाती है। फ़ैज़ की शायरी ने यह काम बख़ूबी सरअंजाम दिया है।वो जो बज़ाहिर कुछ नहीं लगते, उन से रिश्ते बला के होते हैं।
हालांकि यह भी एक हक़ीक़त है कि अच्छी शायरी किसी ख़ास सरोकार के तहत भी की जा सकती है। उर्दू शायरी में ऐसी मिसालों की भरमार है। मसलन, फिरदौसी का शाहनामा, सौदा के क़सीदे, मीर अनीस के मर्सिये, ‘हालीकी मुसदस्से हाली, अल्लामा इक़बाल का शिकवा जवाब-ए-शिकवा और हफीज़ जालंधरी का शाहनामा-ए-इस्लाम वग़ैरा ऐसे शाहकार हैं जिनकी रचना में सरोकारों की कारफ़रमायी थी। वहीं, एक बात जो ख़ास तौर पर समझने की है, वह यह कि फ़ै़ज़ का ख़ुद के सरोकारों से रिश्ता कोरा वैचारिक, नैतिक या कोई रस्मी नहीं है। वे उनके ख़ुद के सरोकार हैं, खु़द कमाये हुए, ‘ऑर्गेनिकऔर अपरिहार्य। इनमें उनके वास्तविक और निजी स्टेक्सथे। सामाजिक सरोकार और निजी सरोकारों में, ऐतिहासिक कार्यसूची और निजी कार्यसूची में उनके लिए कोई अंतर न था। इसीलिए रेटरिककासहारा लेने की ज़रूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई। हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे, जो दिल पे गुज़रती है, रक़म करते रहेंगे। यही उनकी शायरी की विशेषता है—उन्होने जैसा जिया, समझा, बरता, महसूस किया वैसा ही काग़ज़ पर उकेर दिया।
लहजे की शायरी में लोकप्रिय होने की संभावनाएं बहुत होती हैं। दाग़ देहलवी सिर्फ़ अपने लहजे की खनक की वजह ही से अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शायरों में गिने जाते हैं। दाग़ का लहजा ज़बान के चटख़ारे, मुहावरे की चाशनी और रोज़-मर्रा की महक का मुरक्कब था। जबकि फ़ैज़ अपने धीमे, शीरीं, ख़्वाबीदा और बुनियादी तौर पर रूमान से भरे लहजे की वजह से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करते रहे। उनकी शायरी में अमूर्त क्रांतिकारी रूमान, अमूर्त देशप्रेम या अमूर्त आवारगी और दीवानगी की मुखतलिफ़ भंगिमाएं सामने आती हैं। फ़ैज़ के अल्फ़ाज़ अगर बजने के बजाय गूंजते हैं, सच्चे लगते हैं और दिल में उतरते हैं तो उसकी बड़ी वजह यही है कि वे असल की ताक़त लेकर आते हैं। बात चाहे मज़दूरों के शोषण की हो या वारदात-ए-इश्क़-ओ-हुस्न का बयान, फ़ैज़ नें हर तरह के मुद्दों-मसलों पर अपने ख़ास अंदाज़ और लहजे में शायरी की है। ग़म-ए-जहां हो, रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू। सुलूक जिससे किया, हम ने आशिक़ाना किया।