Monday, March 2, 2015

मासूम धोखा


वित्तमंत्री अरुण जेटली का बजट भाषण सुनते हुए मुझे अनायास ही प्रसिद्ध अर्थशास्त्री-राजनयिक जॉन केनेथ गालब्रेथ और उनकी पुस्तक द अफ़फ़्लुएंट सोसाइटी का स्मरण हो आया। इस पुस्तक में उन्होने ने सामाजिक संतुलन का तसव्वुर पेश किया। सामाजिक संतुलन का मतलब है निजी और सार्वजनिक व्यय के बीच स्वीकार्य संबंध। शिक्षा, जनस्वास्थ्य, सार्वजनिक परिवहन, सामाजिक सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों में इतना सार्वजनिक व्यय होना चाहिए कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आम आदमी की जेबें न ढीली हों, उनका ख़ुद का बजट न गड़बड़ाए।
उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार का यह बजट तीन मामलों में दिलचस्प है। पहला, लगभग तीस साल बाद यह एक ऐसी सरकार द्वारा पेश किया जा रहा है जो पूर्णतः बहुमत में है। इसलिए सरकार को अपनी नीति और आकांक्षाओं के अनुरूप बजट बनाने की पूरी स्वतन्त्रता है। दूसरे, चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी आ चुकी है, और इसके सुझाव 1 अप्रैल 2015 से लागू होंगे और 31 मार्च 2020 तक लागू रहेंगे। तीसरा, सरकार ने योजना आयोग भंग करके नीति आयोग नामक दूसरा संस्थान बनाया है, जो दिशात्मक और नीति निर्धारक थिंक टैंक है। हो सकता है इन तीनों परिघटनाओं ने भी  सरकार के बजट निर्माण की परिक्रिया को प्रभावित किया हो।
प्रधान मंत्री मोदी ने लाल क़िले की प्रचीर से कहा था कि देश तीन डी’—डेमॉक्रेसी (लोकतन्त्र), डेमॉग्राफी (जनांकीय) और डिमांड (मांग)—से समृद्धित है। वास्तव में ये तीन डीतभी कारगर होंगे जब देश में स्वास्थ्य और शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पुख्ता इंतज़ाम हो और इन तक देशवासियों की सहर्ष पहुँच हों। मानवीय व लोकतांत्रिक चेतना पैदा करने के लिया शिक्षा की आवश्यकता है। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य से बेहतर मानव पूंजी का निर्माण होता है, और यही कुशल मानव पूंजी जनांकीय भाज्य है। ज़ाहिर है जब यह मानव पूंजी अर्थव्यवस्था में विनोयोजित होगी तो मांग उत्पन्न करेगी। कुल मिला कर सामाजिक क्षेत्रक मजबूत होना चाहिए।

दो दिन पहले मोदी सरकार का पहला पूर्ण बजट लोकसभा में पेश किया गया। चूंकि मोदी सबके विकासकी बात किया करते हैं तो ऐसी प्रत्याशा थी कि इस बजट में सामाजिक व लोक कल्याणकारी योजानाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। लेकिन आशा के विपरीत इन योजनाओं और कार्यक्रमों में काफी फ़ंडकट हुआ। मसलन, स्कूली शिक्षा की मदों में आवंटन पिछले वर्ष की अपेक्षा 23 प्रतिशत कम कर दिया गाया। ज़ाहिर है इससे कौशल निर्माण पर प्रभाव पड़ेगा। जबकि उच्च शिक्षा के आवंटन में 3 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी की गयी। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन इस बजटीय आवंटन में बच्चो से संबधित योजनाओं/कार्यक्रमों में 56 प्रतिशत से भी अधिक की कटौती कर दी  गयी। इस तथ्य को भी पूरो तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए कि भारत ग्रामों में बसता है, ग्रामीण विकाससे संबन्धित योजनाओं में 10 फीसदी का फंड-कट हुआ। मानव विकास के अहम पहलू, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण की मद में भी 16 प्रतिशत की कटौती की गयी। देश में वक़्त-बेवक़्त जापानी इन्सेफ़्लाइटिस, स्वाइन फ़्लू, येलोफ़ीवर और इन जैसी अनेक बीमारियाँ पैर पसार देती है। इन रोगों से निपटने के लिए इनकी एपीडेमेओलॉजिकल स्टडी व अनुसंधान ज़रूरी है। इस बजट में स्वास्थ्य अनुसंधान में कोई बढ़ोतरी नहीं कि गयी। इतना ही नहीं एड्स नियंत्रण कार्यक्रमों में भी 22 प्रतिशत आवंटन कम किया गया।
गालब्रेथ ने अपनी एक अन्य पुस्तक—इकॉनोमिक्स ऑफ इनोसेंट फ्रॉड: ट्रुथ ऑफ अवर टाइम—में बताया है कि अमेरिकी समाज कैसे पूँजीवाद के लिए अब बाजार अर्थव्यवस्था शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। यथार्थ को छिपाने के लिए मनोहारी शब्द-जाल बुना जाता है। गालब्रेथ इसे निरीह कपट का सटीक उदाहरण मानते हैं। सबका साथ और सबका विकास भी ऐसा ही मासूम धोखा है। सच्चाई तो यह है कि एक तरफ तो सम्पत्ति कर (वेल्थ टेक्स) को हटाया गया तो दूसरी तरफ़ कॉर्पोरशंस का कॉर्पोरेट टैक्स 30 से घटा के 25 प्रतिशत किया। पूंजीपतियों के विकास की राहें हमवार कि जा रही हैं तो ग़रीब से लोगों से उनके रोजगार की गारंटी छीनी जा रही है जिससे निश्चय ही सामाजिक संतुलन बिगड़ेगा।

Tuesday, February 10, 2015

रंग पैरहन का

रंग पैरहन का, ख़ुशबू ज़ुल्फ़ लहराने का नाम, मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम। यह शेर है उर्दू के विश्वप्रसिद्ध शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का, जिनके बग़ैर उर्दू साहित्य और भाषा का इतिहास अधूरा है। फ़ैज़ ठीक 104 साल पहले, 13 फरवरी 1911 को स्यालकोट में पैदा हुए। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं हुई और उच्च शिक्षा के लिए गर्वनमेंट कॉलिज लाहौर आ गए, जहां से उन्होने ने बीए ऑनर्स अरबी भाषा और साहित्य और अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया। 1935  में फ़ैज़ ने एमएओ कॉलिज अमृतसर में अंग्रेज़ी साहित्य के प्राध्यापक की हैसियत से शमूलीयत इख़तियार की। 1942 में वे ब्रिटिश फ़ौज में कैप्टन हो गए और दूसरे विश्व-युद्ध में हिस्सा लिया। 15 अगस्त 1947 को अग्रेज़ों ने जाते जाते देश के दो टुकड़े कर दिये। वे पाकिस्तान में रहे और 1951 में उन पर रावलपिंडी साज़िश केस का मशहूर मुक़द्दमा भी हुआ और उन्हें क़ैद-ओ-बंद की दुश्वारियाँ भी बर्दाश्त करनी पड़ीं। क़ैद का यह ज़माना में उनकी शायरी में एक नया निखार लेकर आया। कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हाथ में तेरा हाथ नहीं। सद शुक्र कि अपनी रातों में, अब हिज्र की कोई रात नहीं। फ़ैज़ के ऐसे तमाम शेर जो उनके कारावास के दिनों की ही याद हैं जिन्हों ने उनको साहित्य की दुनिया का ताबिंदा सितारा बना दिया।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ वह एकमात्र पाकिस्तानी शायर हैं जिन को चार बार साहित्य के नोबल इनाम के लिए नामज़द किया गया। उन्हें 1962 में लेनिन पीस प्राइज़ भी नवाज़ा गया। फ़ैज़ की शायरी पर पंजाबी सूफ़ी रवायात और सोशलिज़्म की छाप भी नुमायां हैं। फ़ैज़ को उर्दू पोइट्री का नेरूदा भी कहा जाता है। पाब्लो नेरुदा की तरह फ़ैज़ ने शायरी को सामाजिक मुद्दों को विभिन्न एहसासात से जोड़ते हुए यादगार रुमानवी गीतों का हिस्सा बना दिया। फ़ैज़ अपनी शायरी में सिर्फ़ भौतिक मुद्दों पर ही तवज्जों नहीं देते बल्कि ठोस वास्तविक मामलों का ज़िक्र करते हुए मिलते हैं। नेरूदा के मामले में भी यह बात दुरुस्त है। दोनों ने हक़ीक़ी मसायल को मौज़ू बनाया। रोटी की बात की। शांति और सुरक्षा के लिए दोनों ने क़लम उठाया। लिबरल और सेक्युलर मूल्यों पर यक़ीन रखने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ अपनी प्रगतिशील सोच और शायरी से पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया की अब तक की तीन पीढ़ियों को प्रभावित कर चुके हैं। पाब्लो नेरूदा को भी तक़रीबन वैसे ही हालात का सामना करना पड़ा जैसे फ़ैज़ को दरपेश रहे। फ़ैज़ के शायरी की ख़ास बात यह कि उन्होने जो बिम्ब, उपमाएँ, शब्द, लय, मूसीक़ीयत और शायराना ख़ाके अपनाए वे पुराने पड़ते दिखाई नहीं देते — ये देश काल से परे हैं।
फ़ैज़ की शायरी अपनी फ़ितरत में सियासी रंग लिए हुए है — अच्छी शायरी की यही विशेषता होती है कि इसमें रोज़मर्रा ज़िन्दगी के मसाएल और मुहावरे मिलते हैं। मीर, ग़ालिब और हाफ़िज़ जैसे महान कवियों की शायरी की भी यही विशेषता रही है। उनकी शायरी ने ज़हनों को रोशन किया है। हमें दुनिया भर में मौजूद विभिन्न संस्कृतियों को समझना और उन का सम्मान करना सिखाया। फ़ैज़ की कविता में जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है दबे-कुचलों के प्रति दुख-दर्द की भावना, जनमानस से अटूट रिश्ता। वे एक तरफ़ अफ़्रीक़ा के मामलों पर सहानुभूति प्रकट करते दिखाई देते हैं और साथ ही फ़लस्तीन के मसले की बाबत बात करते नज़र आते हैं। वे अफ्रीकी स्वतन्त्रता प्रेमियों के समर्थन में अफ्रीक़ा कम बैक का नारा लगाते हैं और साम्राज्यवादियों से संघर्षरत अरबों के समर्थन में सर-ए-वादी-सना और फिलिस्तीनी बाँकों को श्रद्धांजलि पेश करने के लिए दो नज़्में फिलिस्तीन के लिए लिखकर अपना क्षोभ प्रकट करते हैं। शायरी की सब से ख़ास बात ही ये है कि ये हमें दूसरों का दर्द महसूस करना सिखाती है। फ़ैज़ की शायरी ने यह काम बख़ूबी सरअंजाम दिया है।वो जो बज़ाहिर कुछ नहीं लगते, उन से रिश्ते बला के होते हैं।
हालांकि यह भी एक हक़ीक़त है कि अच्छी शायरी किसी ख़ास सरोकार के तहत भी की जा सकती है। उर्दू शायरी में ऐसी मिसालों की भरमार है। मसलन, फिरदौसी का शाहनामा, सौदा के क़सीदे, मीर अनीस के मर्सिये, ‘हालीकी मुसदस्से हाली, अल्लामा इक़बाल का शिकवा जवाब-ए-शिकवा और हफीज़ जालंधरी का शाहनामा-ए-इस्लाम वग़ैरा ऐसे शाहकार हैं जिनकी रचना में सरोकारों की कारफ़रमायी थी। वहीं, एक बात जो ख़ास तौर पर समझने की है, वह यह कि फ़ै़ज़ का ख़ुद के सरोकारों से रिश्ता कोरा वैचारिक, नैतिक या कोई रस्मी नहीं है। वे उनके ख़ुद के सरोकार हैं, खु़द कमाये हुए, ‘ऑर्गेनिकऔर अपरिहार्य। इनमें उनके वास्तविक और निजी स्टेक्सथे। सामाजिक सरोकार और निजी सरोकारों में, ऐतिहासिक कार्यसूची और निजी कार्यसूची में उनके लिए कोई अंतर न था। इसीलिए रेटरिककासहारा लेने की ज़रूरत उन्हें कभी महसूस नहीं हुई। हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे, जो दिल पे गुज़रती है, रक़म करते रहेंगे। यही उनकी शायरी की विशेषता है—उन्होने जैसा जिया, समझा, बरता, महसूस किया वैसा ही काग़ज़ पर उकेर दिया।
लहजे की शायरी में लोकप्रिय होने की संभावनाएं बहुत होती हैं। दाग़ देहलवी सिर्फ़ अपने लहजे की खनक की वजह ही से अपने समय के अत्यंत लोकप्रिय शायरों में गिने जाते हैं। दाग़ का लहजा ज़बान के चटख़ारे, मुहावरे की चाशनी और रोज़-मर्रा की महक का मुरक्कब था। जबकि फ़ैज़ अपने धीमे, शीरीं, ख़्वाबीदा और बुनियादी तौर पर रूमान से भरे लहजे की वजह से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करते रहे। उनकी शायरी में अमूर्त क्रांतिकारी रूमान, अमूर्त देशप्रेम या अमूर्त आवारगी और दीवानगी की मुखतलिफ़ भंगिमाएं सामने आती हैं। फ़ैज़ के अल्फ़ाज़ अगर बजने के बजाय गूंजते हैं, सच्चे लगते हैं और दिल में उतरते हैं तो उसकी बड़ी वजह यही है कि वे असल की ताक़त लेकर आते हैं। बात चाहे मज़दूरों के शोषण की हो या वारदात-ए-इश्क़-ओ-हुस्न का बयान, फ़ैज़ नें हर तरह के मुद्दों-मसलों पर अपने ख़ास अंदाज़ और लहजे में शायरी की है। ग़म-ए-जहां हो, रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू। सुलूक जिससे किया, हम ने आशिक़ाना किया।

Tuesday, January 6, 2015

सलीब पर किसान


पिछले दिनों महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में 75 साल के एक किसान द्वारा खुद को चिता में जलाने की हृदय विदारक घटना सामने आई थी। यह घटना, देश में तेजी से बढ़ रहे किसानों की आत्महत्या के मामलों में से एक है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और पंजाब समेत देश के कई राज्यों में ऐसी घटनाओं में तेजी देखी गई है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा प्रकाशित एक्सीडेंटल डेथ एंड स्यूसाइड इन इंडिया-2013 नामक दस्तावेज के अनुसार साल 2003-2013 यानी एक दशक की अवधि में हर साल औसत एक लाख से ज्यादा व्यक्तियों ने भारत में आत्महत्या की। आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में स्वरोजगार में लगे लोगों की संख्या 38 प्रतिशत है। इस 38 फीसदी की तादाद में 8.7 प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी यानी किसान श्रेणी के हैं। वहीं ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2013 में 11,744 किसानों ने आत्महत्या की जबकि 2012 में 13,754 किसानों ने आत्महत्या की थी। भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, लागत बढ़ने, सिंचाई के अभाव, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं। 1995 से लेकर अब तक लगभग तीन किसान आत्महत्या कर चुके हैं।
प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट में प्रकाशित जॉनथन कनेडी और लारेंस किंग के एक लेख पॉलिटिकल इकॉनॉमी ऑफ फार्मर्स स्यूसाइड इन इंडियामें कहा गया है कि नगदी फसलों की खेती करने वाले, एक हैक्टेयर से कम जमीन के मालिक किसानों के आत्महत्या करने की आशंका ज्यादा है। क्योंकि फसलों की कीमतों में होने वाली उतार-चढाव (मूल्य अस्थिरता) का वे सबसे ज्यादा शिकार होते हैं, साथ ही उनके बारे में यह आशंका लगी रहती है कि वे बकाया कर्ज नहीं चुका पाएंगे। कनेडी और किंग के इस अध्ययन में भारत में मौजूद आत्महत्या की परिघटना को महामारी की संज्ञा देते हुए नोट किया गया है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में आत्महत्या की दर शहरी इलाकों की अपेक्षा दोगुनी है।
ग़ौरतलब है कि किसान की आत्महत्याओं की घटनाएँ उन राज्यों में अधिक हुई हैं जहां किसान मूलत: कपास और गन्ना जैसी नगदी फसलें उगाते हैं। इन फसलों की लागत बहुत अधिक आती है। जिसके लिए इन राज्यों के किसान 24 से 50 प्रतिशत ब्याज पर निजी साहूकारों से ऋण लेते हैं, जिसे अदा करने की उनकी क्षमता नहीं होती। अंततः वे ऋण और ग़रीबी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। भारत में किसानों की इस के संकट के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण कारफ़रमा हैं। पहला, जहां एक तरफ खेती-किसानी की लागत में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है तो वहीं दूसरी तरफ़ लागत के अनुपात में कृषि उत्पाद के मूल्य में कमी हो रही है। दूसरा कृषि ऋण की अपर्याप्त व्यवस्था। और तीसरा, सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी को निरंतर घटता जाना।
उल्लेखनीय है कि इस नव-उदारवादी व्यवस्था में, राजकोषीय घाटा को कम करने के दिशा में कृषि सब्सिडी की लगातार कटौती की जा रही है जिसका सीधा असर कृषि की लागत या इनपुट्स पर पड़ता है। इस प्रकार किसान को कर्ज लेकर खेती करने के लिए मजबूर होता है। कर्ज लेने के बाद चक्रवृद्धि ब्याज के चक्कर में अदायगी राशि भी दो चार और सौ गुनी तक हो जाती है। वह इस शिकंजे से अपना खेत-खलियान बेचकर भी नहीं निकाल सकता। आखिरकार वह अपना आत्मसम्मान बचाने के लिए वह आत्महत्या कर लेता है।
देश में ऐसी वित्तीय संस्थाओं और व्यवस्था का नितांत अभाव है जो दूर दराज़ के छोटे और मँझोले किसानों को वाजिब दर पर ऋण दिला सकें। दूसरे अगर हैं भी तो इन सरकारी बैंक संस्थाएं से ऋण लेने में इतने कागज़ी झमेलों करने पड़ते हैं जिसे पूरा कर पाना इन किसानों के बस का नहीं। हालांकि मोदी सरकार ने इससे निपटने के लिए जनधन योजनानामक कार्यक्रम चलाया है। अब यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि किसानों को इससे कितनी राहत मिली। लेकिन, फिलवक्त किसानों को किफ़ायती दर पर ऋण नहीं मिलता।
1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 53.1 प्रतिशत थी जो वर्ष 2012-13 में घटकर मात्र 13 प्रतिशत रह गई। खेती अब घाटे का सौदा बन गई है। अब तक ढेढ़ करोड़ किसान कृषि से पलायन कर चुके हैं और प्रतिदिन खेती छोड़ने वाले किसानों की तादाद 2 हजार से ज़्यादा हो गई है। डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि भारत के चालीस फीसदी किसान अब खेती छोड़ने को तत्पर हैं क्योंकि किसान को मिलने वाली खाद्यान्न की कीमत में 80 फीसदी लागत और मात्र 20 फीसदी उसका श्रम मूल्य होता है।
किसान के हाथ से जमीन निकलती जा रही है और वह भूमिहीन खेत मजदूर बनता जा रहा है। सरकार की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 प्रतिशत आबादी का देश की कुल खेतिहार भूमि के केवल 5 प्रतिशत पर अधिकार है जबकि 10 प्रतिशत जनसंख्या का 55 प्रतिशत जमीन पर नियंत्रण है। और तो और पिछले सप्ताह मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण, पुनव्र्यवस्थापन एवं पुनर्वास  में पारदर्शिता और न्यायोचित मुआवजे का अधिकार (संशोधन) अधिनियम 2013के कुछ प्रावधानों का संशोधन करने के लिए अध्यादेश जारी किया गया है। इसके तहत अब कृषि भूमि अधिग्रहण का कार्यक्रम बिना रोक-टोक के जारी रह सकेगा। ध्यातव्य हो कि। अधिग्रहण के कारण खेती का रकबा लगातार सिकुड़ता गया है। विगत चार दशकों में इस रकबे में 18.5 प्रतिशत की कमी चुकी है। वर्ष 1960-61 में प्रति व्यक्ति खेती योग्य 2.63 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध थी जो घटकर 2008 में 0.8 हेक्टेयर रह गई। बहुराष्ट्रीय कंपनियां और देशी कार्पोरेट, किसानों को निशाने पर रख मुनाफा कमाना चाहते हैं। मौजूदा अध्यादेश इसी मकसद को और आसानी से पूरा करता नजर रहा है। कहने को सरकार कह रही है कि इससे गरीब किसानों को सस्ते मूल्य पर आवास उपलब्ध करायेगी, उनका विकास होगा। लेकिन किसान आत्महत्याओं को दूर करने में यह कानून, किस प्रकार कारगर होगा, बताया जाना चाहिए।
किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य और उनके आर्थिक संकट की दशा में वित्तीय संरक्षण दिये बिना आत्महत्याओं की यह महामारीख़त्म नहीं होने वाली। साथ ही किसानों को अपनी ज़मीन बचाने के लिए भी लामबंद होना पड़ेगा।